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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 549 में से

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पृष्ठ 319

अरण्यकाण्ड ३०६

और विकास से हीन हैं तथा जिनके गुणों में परिवर्त्तन नहीं होता, भले ही वे विनष्ट हो जायें, तो भी मैं अविनेश्वर पद की प्राप्ति का उपाय करना नहीं छोड़ूँगा ।

इस प्रकार, जब ( शरभंग ) कह रहे थे, तभी सुदृढ़ तथा गठीले धनुष को धारण करनेवाले वीर उस आश्रम के निकट आ पहुँचे और वहाँ होनेवाले कोलाहल को सुनकर, उसका कारण क्या है—यह सोचते हुए खड़े रहे ।

तब उन्होंने देखा कि उज्ज्वल कांतिवाले हीरक-जटित वलयों से भूषित, परस्पर समान चार दाँतों से युक्त, आलान में बाँधे जानेवाला ( अति महान् ) गज वहाँ खड़ा है । उससे उन्होंने जान लिया कि उस महातपस्वी के पास देवेन्द्र आया है ।

हरिणी-सदृश नयनोंवाली देवी के साथ लक्ष्मण को उस पुष्पोद्यान के बाहर छोड़-कर रामचन्द्र ( अकेले ) उस विशाल वन में वृषभ और सिंह के जैसे गये । तब—

देवताओं के स्वामी ने उस स्थान में दर्शन-दुर्लभ, चतुर्वेदों के फल को (अर्थात्, भगवान् के अवतार राम को ) अपने सहस्र नेत्रों से इस प्रकार देखा, मानो कमलसम नयन-वाला एक नीलवर्ण सूर्य को ही देख रहा हो ।

इन्द्र उन्हें देखकर मन-ही-मन दुःखी हुआ ( क्योंकि उन देवों की रक्षा के लिए ही रामचन्द्र को वन का दुःख भोगना पड़ रहा है ) । फिर, उसने मुनियों के नायक उस पुरुषोत्तम को, नित्य प्रणाम करनेवाले अपने शिर से तथा स्तंभ-समान अपनी भुजाओं से नमस्कार किया ।

उस ( नारायण के अवतारभूत राम ) को—जो ध्वजाओं से भरे हुए युद्धों में शत्रुओं का ( असुरों का ) विनाश करके, विशाल समुद्र-समान वेदों के पदों के अर्थ को समझाकर, नित्य धर्म के सन्मार्ग पर ( लोगों को ) चलाकर, संपत्ति और मोक्ष-पद देकर, (प्राणियों की) रक्षा करनेवाला अविश्वर कवच बनकर, उनके प्राण बनकर, तपस्या बनकर, नेत्र बनकर एवं अन्तहीन ज्ञान बनकर ( सब लोकों की ) रक्षा करता है—देखकर वह इन्द्र अपने को भूल गया, द्रवितचित्त हुआ, एक ओर खड़ा रहा और उस ( राम ) की महिमा का एक साधारण व्यक्ति के समान ही गान् करने लगा ।

तुम ऐसी ज्योति हो,जो सब पदार्थों में ( अंतर्यामी के रूप में ) मिली रहती है, तथापि निर्लिप्त रहती है । तुम आसक्ति-हीन ( विरक्त ) व्यक्तियों के बंधु हो । अपार करुणा का आवास हो । वेदोक्त मार्ग से विवेचन करने से उत्पन्न होनेवाले तत्त्वज्ञान के विषय हो । हे हमारी माता एवं पिता ! हम, तुम्हारे दासों ने जब शत्रुओं से पीड़ित होकर तुम्हारी प्रार्थना की, तब यथाप्रदत्त वरदान के अनुसार तुम हमारी सहायता करने के लिए ( इस रूप में ) अवतीर्ण हुए हो । अन्यथा, क्या तुम्हारे चरण-कमलयुगल इस विशाल धरती के योग्य हैं ?

( तुम्हारी देह की कांति की छाया से ) नीलवर्ण बने ( क्षीर- ) सागर में शयन करनेवाले हे देव ! ( तुम्हारे ) शत्रु नहीं हैं । मित्र भी नहीं हैं । ( तुम्हारे लिए ) प्रकाश नहीं, अंधकार भी नहीं है । यौवन भी नहीं, बुढ़ापा भी नहीं है । आदि, मध्य और अंत भी नहीं हैं । तुम्हारी ऐसी दशा हो रही है । किंतु, यदि तुम यों हाथ में धनुष लिये हुए, अपने

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