कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३११
उस मुनि के आश्रम में आकर वे यो आनन्दित हुए, जैसे क्षीरसागर में (शेष) शयन पर ही विश्राम कर रहे हों।
उस स्थान में, तत्त्वज्ञ मुनि के धर्ममय उपदेश सुनते हुए रामचन्द्र ने हरिणी-समान नयनोंवाली देवी के साथ वह अंधकार-भरी रात्रि व्यतीत की।
तब सूर्य, संसार को आवृत करनेवाले घने अंधकार-रूपी चादर को अपने सब दिशाओं में परिव्याप्त अपरिमेय उज्ज्वल करों के आतप-रूपी धारवाले करवाल से हटाने लगा।
उस समय, तत्त्वज्ञ मुनि ने उन (राम) के सम्मुख ही अग्नि को प्रज्वलित करके उसमें प्रवेश करने का विचार किया और शास्त्रोक्त विधि से सत्वर अग्नि प्रज्वलित करके रामचन्द्र से प्रार्थना की कि अब मुझे आज्ञा दीजिए।
दृढ धनुष्य (धनुष के प्रयोग मे निपुण) राम ने वेदों में निपुण (शरभंग) को देखकर कहा—आप क्या करना चाहते हैं, बताइए। तब मुनि ने कहा—हे लक्ष्मी-नायक ! मै मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा से अग्नि में प्रवेश करना चाहता हूँ, आप आज्ञा देने की कृपा कीजिए।
रामचन्द्र ने उनसे प्रश्न किया—अजिन (मृगचर्म) से शोभायमान वस्त्रवाले, हे मुनिवर ! मेरे आगमन के समय आप यह क्या कर रहे हैं ? तब मन्मथ की विजय को कुंठित करनेवाली मानसिक दृढता से युक्त उस मुनिवर ने अपना शरीर त्याग करने के उमंग में यों उत्तर दिया—
हे विजयशील ! विविध प्रकार की तपस्यायों में निरत रहनेवाला मैं—तुम अवश्य यहाँ आओगे, यह निश्चय करके तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब मेरे दोनों प्रकार के कर्मों का बंधन टूट गया। जैसे घटित होना था, वैसे ही हुआ और तुम आये। अब मेरे लिए यहाँ और कोई कार्य नहीं रह गया है।
हे शक्तिशाली ! इन्द्र ने आकर कहा था कि कमलभव ब्रह्मा ने तुम्हे सत्यलोक का निवास प्रदान किया है। प्रलय-काल तक तुम वहीं रह सकते हो। किन्तु, शाश्वत परमपद की प्राप्ति की कामना करनेवाले मैंने उस सत्यलोक को पाना नहीं चाहा।
अपौरुषेय वेदों के लिए भी अज्ञेय परमतत्त्व को जाननेवाले (शरभंग) ने कहा कि तुम ऐसी कृपा करो कि मैं परमपद प्राप्त करूँ। फिर, अपनी प्रिय पत्नी के साथ उग्र अग्नि में प्रवेश करके अनुपम अपवर्ग-पद में जा पहुँचे।
भावी को जाननेवाले, महिमामय सुगंधित कमल में उत्पन्न ब्रह्मा आदि देव, मुनिगण तथा अन्य लोग भी, दोनों कर्मों के बंधन से मुक्त होकर जिस पद को प्राप्त करने की कामना करते हैं, उस पद में वे मुनिवर जा पहुँचे।
अखिल ब्रह्मांड को अज्ञेय रूप में निगलनेवाले (भगवान् राम) के एक नाम को जो जानते हैं, उनके पुण्य-फल भी विचार से परे होते हैं। फिर, जो अपने अंतिम समय में उस भगवान् के दर्शन करते हैं, उनको कौन-सा बड़ा पद प्राप्त होगा, इसको कौन जान सकता है। (१-४४)