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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 549 में से

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पृष्ठ 343

अरण्यकाण्ड ३३३

पकड़ने के लिए उनका पीछा करती हुई गई । फल-भरे उद्यान में स्थित लक्ष्मण ने यह देख लिया ।

उन्होंने क्रुद्ध होकर गरजते हुए कहा—अरी ! ठहर । फिर, झट उसके निकट आकर देखा—यह स्त्री है, हाथ मे धनुष लिया नही है; फिर उस (शूर्पणखा) के भड़कती आग-जैसे दीखनेवाले केशो को अपने अरुण कर से ऐंठकर पकड़ लिया । उसके पेट पर शीघ्रता से एक पदाघात किया और अपने कर मे उज्ज्वल करवाल धारण किया ।

तब वह उन (लक्ष्मण) को भी उठाकर आकाश-मार्ग से उड़ जाने का प्रयत्न करने लगी । इतने में (लक्ष्मण ने) उसे झट नीचे ढकेल दिया और 'अब-आगे कभी ऐसा कार्य न करना'—कहते हुए उसकी नाक, कान और कठोर स्तन के चूचुको को एक-एक कर के काट दिया । फिर शातकोप होकर उसके केशो को छोड़ दिया ।

उस क्षण, वह (शूर्पणखा) अपना मुँह खोलकर चिल्ला उठी । वह ध्वनि सब दिशाओ मे व्याप्त हो गई और देवताओ के कानो मे भी जा पड़ी । अब उसकी दशा का क्या वर्णन करना है ? उसकी नाक के छेद से प्रवाहित रक्त से धरती गल गई ।

उसकी हत्या न करके, लक्ष्मण ने अपने उज्ज्वल करवाल से उस क्रूर (राक्षसी) के नाक-कान काट दिये । वह कार्य ऐसा था, जैसे रावण के रत्नमय मुकुट-भूषित शिरो को काटने के लिए सुदिन का निर्णय करके, उसका प्रारंभ करते हुए पर्वत-शिखर को ही उन्होने काट दिया हो ।

वह धरती पर धड़ाम से गिर पड़ी और पैर उछालती हुई दहाड़ मारकर रोने लगी । वह ऐसी दिखाई पड़ती थी, मानो यम के समान कठोर शूल को धारण करनेवाले क्षुब्ध हो युद्ध करनेवाले खर प्रभृति राक्षसो के विनाश की सूचना देता हुआ कोई कालमेघ रक्त की वर्षा कर रहा हो ।

दुःख स्वयं जिनसे डरकर दूर भागता था, ऐसे राक्षसो के कुल मे उत्पन्न वह स्त्री, आकाश में उछलती, धरती पर गिरती, लोट जाती, शिथिल पड़ जाती, व्याकुल हो हाथ मलती, मूर्च्छित होती, मूर्च्छा से जग पड़ती, बार-बार कहती—मुझ स्त्री-जन्म पानेवाली का आज कैसा पराभव हुआ ?

हाथ से नाक दबाती, लुहार की भाँथी के जैसे निःश्वास भरती, धरती पर हाथ मारती, अपने युगल स्तनो पर हाथ रखती, उसकी देह स्वेद से भर जाती, अपने बलवान् पैरो को लिये चारो ओर दौड़ती, फिर रक्त बहाती हुई शिथिल पड़ जाती ।

स्रोत से उमड़नेवाले जल के समान बहनेवाले लहू से जो कीचड़ बन गया, उसमें लोटती हुई वह राक्षसी पीड़ा को नही सह सकी और अपने कुल के लोगो के नाम पुकार-पुकारकर रोने लगी, जिससे यम भी भयभीत हो गया और देवता भय से भागने लगे ।

अग्नि-ज्वाला को कर में धारण करनेवाले (शिव) के पर्वत (कैलास) को उखाड़कर उठानेवाले, हे पर्वत (सदृश रावण) ! तुम्हारे धरती पर जीवित रहते हुए ये मुनिवेषधारी धनुष लेकर घूम रहे हैं । क्या यह तुम्हारे लिए अपमानजनक नही है ?