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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 549 में से

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पृष्ठ 377
अररायकाण्ड३६७

रथ-तुल्य जघन-तट से शोभित वह सीता, देवलोक में या इस लोक में किसी कंचुक-बद्ध स्तनवाली स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नहीं है। पूर्वकाल में, शंख के समान श्वेत जलवाले समुद्र ने, देवासुरों के द्वारा मथे जाने पर प्रफुल्ल कमल में आसीन लक्ष्मी को उत्पन्न किया था। अब भूमि, उस लक्ष्मी को भी परास्त करनेवाली सीता को देकर धन्य हुई है।

मीनकेतन के आनन्द को बढ़ाते हुए, संसार की प्रशंसा का पात्र बनते हुए, भ्रमरों से आवासित पुष्पों से विभूषित कुन्तलोंवाली तथा सूक्ष्म कटिवाली सीता को तुम अपना स्वत्व बना लो और अपने पराक्रम का प्रदर्शन करके राम को मेरे वश में दे दो।

हे मेरे प्रभु ! यद्यपि भाग्य हमें (जीवन के) फल प्रदान करता है, तो भी महान् तपस्वियों को भी वे फल, समय पर ही प्राप्त होते हैं। उसके पूर्व नहीं मिलते हैं। दस मुख, बीस नयन, बीस हाथ, सुन्दर रूप और मनोहर वक्ष से शोभायमान तुम अब आगे चल-कर ही बड़ा गौरव प्राप्त करनेवाले हो।

इस प्रकार की सीता को तुम्हारे पास पहुँचाने के विचार से मैं उसके निकट गई, तब उस राम के भाई ने बीच में पड़कर चमकते हुए कटार से मेरी नाक काट दी। मेरा जीवन तो तभी समाप्त हो गया। फिर भी, इस विचार से कि तुम्हारे सम्मुख आकर सारा वृत्तांत बताने के पश्चात् ही अपने प्राण त्याग करूँगी, यहाँ आई हूँ, यों शूर्पणखा ने कहा।

(शूर्पणखा के वचन सुनते ही रावण के मन में) क्रोध, वीरता, अभिमान के कारण उत्पन्न ताप—ये सब इसी प्रकार मिट गये, जिस प्रकार पाप के रहने के स्थान से धर्म मिट जाता है और जिस प्रकार एक दीप, दूसरे दीप के स्पर्श से प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार रावण के मन में काम-व्याधि और उससे उत्पन्न होनेवाले ताप ने घर कर लिया।

रावण खर को भूल गया, अपनी बहन की नाक को काटनेवाले वीर के पराक्रम को भूल गया, उससे उत्पन्न अपने अपयश को भूल गया, शिव को जीतनेवाले मन्मथ के बाणों के प्रभाव के कारण वह पूर्वकाल में प्राप्त अपने वरों को भी भूल गया, किन्तु सीता, जिसके रूप के विषय में उसने अभी सुना था, उसको नहीं भूल सका।

सूक्ष्म कटिवाली सीता का नाम और रावण का मन दोनों एक होकर रह गये। अब सीता के अतिरिक्त अन्य किसी विषय के बारे में सोचने के लिए भी उसके पास दूसरा मन कहाँ था ? सीता को भूलने का कोई उपाय ही उसके पास नहीं था। पढ़े-लिखे व्यक्ति भी जबतक आत्म-ज्ञान नहीं प्राप्त करते, तबतक वे काम को कैसे जीत सकते हैं ?

उन्नत प्राचीरवाली लंका का अधिपति, कलापी-तुल्य रूपवाली सीता का हरण करके बंदी बनाने के पूर्व ही उसको अपने मन-रूपी कारागार में बंदी बना लिया। धूप के स्पर्श से मक्खन जैसे पिघलता है, उसी प्रकार शूलधारी रावण का हृदय धीरे-धीरे पिघलने लगा।

विधि की विडंबना के कारण, भावी की प्रबलता के कारण एवं उस लंका का विनाश निकट आने के कारण रावण की काम-व्याधि उसकी सब इन्द्रियों में उसी प्रकार व्याप्त हो गई, जिस प्रकार विद्याविहीन मूढ़ व्यक्ति का छिपकर किया हुआ कोई पाप-कर्म सर्वत्र प्रकट हो जाता है।

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