कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड २२६
दूर हटा दिया था; उनके हस्त के स्वर्णमय अनुपम धनुष को तोड़ देना उस विष्णु के अति- रिक्त अन्य किसी के लिए संभव नहीं था। हे राजन् ! मेरे पिता ने मुझसे कहा था—'तुम इस संसार के सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा की भी सृष्टि करनेवाले भगवान् (विष्णु) की सेवा करोगे। वह सेवा ही उत्तम तपस्या है। हे तात ! उससे मेरा (पिता का) भी बड़ा हित होगा। यह श्रीराम ही वह भगवान् हैं- इसका और भी एक प्रमाण है। मैंने अपने पिता से पूछा था—'तुम्हारे कथित उस भगवान् के अवतार को मैं कैसे पहचान सकूँगा ? तब मेरे पिता ने कहा था—'जब समस्त लोकों को विपदा उत्पन्न होगी, तब वह भगवान् अवतार लेंगे। उसे देखते ही तुम्हारे मन में उसके प्रति प्रेम (भक्ति) उत्पन्न होगा। यही उसे पहचानने का प्रमाण होगा। हे स्वामिन् ! इसी वीर को देखते ही (मेरे मन में ऐसा प्रेम उमड़ा; जिससे) मेरी अस्थियाँ भी गल गईं, जिससे उनका रूप तक पहचानने में नहीं आया। फिर, और क्या शंका हो सकती है ? हे उत्तम ! यदि तुम अब भी उस वीर (श्रीराम) के अपार पराक्रम की परीक्षा करके देखना चाहते हो, तो उसके लिए एक उपाय है। वह यह—अतिविशाल सप्त साल- वृक्ष, जो एक ही पंक्ति में खड़े हैं, उनको एक ही शर से वह वीर छेद डाले। यह सुनकर सुग्रीव आनंदित हुआ और कहा—'अच्छा ! अच्छा। उसने अपने हाथी मान्दति की पर्वतों को भी लज्जित करनेवाली दोनों भुजाओं का आलिंगन कर लिया। फिर, श्रीरामचन्द्र के निकट जाकर कहा—'आपसे मेरा एक निवेदन है। श्रीरामचन्द्र ने वह सुनकर कहा—'कहो; क्या कहना चाहते हो ? (१-२४)
अध्याय ४
सालवृक्ष-छेदन पटल
सुग्रीव, यह कहता हुआ कि इस ओर से जाना है; इधर से आइए (राम को) ले चला और (सालवृक्षों के निकट जाकर) कहा—'गगन को छूनेवाले, आकाश छोटा करते हुए, शाखाओं को फैलाकर खड़े रहनेवाले सात सालवृक्षों को एक ही शर से आप छेद डालें, तो मेरे मन की व्याकुलता दूर होगी। उस निष्कलंक (सुग्रीव) के यह कहने पर देवताओं के प्रभु (राम) उसका विचार जानकर मुस्करा उठे। फिर, अपने विशाल करों से अपने धनुष पर डोरी चढ़ाई। और कल्पना से भी दुर्जेय उन सालवृक्षों के समीप गये। वे वृक्ष ऐसे थे कि प्रलय-काल में भी अपने स्थान से विचलित नहीं होनेवाले थे। जब सब लोक विध्वस्त हो जाते थे, तब भी खड़े रहनेवाले थे। मानो, धरती का आधार बने हुए सातों कुलपर्वत वहाँ आकर एक साथ खड़े हो गये हों।