कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४६७
बलहीनों के पास ही रहने योग्य हो गये हैं ? यदि बलवान् लोग नीच कार्य करेंगे. तो उससे क्या उन्हें अपयश न होकर सुयश प्राप्त होगा ?
हे ( युद्ध में ) किसी की सहायता की अपेक्षा न रखनेवाले वीर ! पिता से दिये गये ऐश्वर्य को उसी समय अपने भाई का स्वत्व बनाकर तुम वनवास के लिए आये । इस प्रकार नगर में तुमने एक ( विलक्षण ) कार्य किया, किंतु मेरे अनुज को यह राज्य देकर वन मे तुमने एक दूसरा ही कार्य किया, इससे बढ़कर भी क्या कोई कार्य हो सकता है ? ( यहाँ वाली व्यंग्य करता है। )
मुखर वीर-वलय तथा विजयमाला को धारण करनेवाले वीर लोग जो भी काम करते हैं, वह वीरों के योग्य ही तो माना जायगा । सब पुरातन शास्त्रों के प्रभु बने हुए तुमने यदि मेरे विषय में ऐसा क्षुद्र कार्य किया है, तो हे क्रोधरहित ! अब लङ्काधिप के अधर्म-कृत्य पर तुम कैसे क्रोध कर सकते हो ?
जब दो व्यक्ति युद्ध करने में निरत हों, तब उन दोनों को समान रूप से न देखकर यदि एक पर दया दिखायो और दूसरे पर आड़ में खड़े होकर अपने दृढ धनुष को भली भाँति झुकाकर तीक्ष्ण बाण को मर्म-स्थान में प्रयुक्त करो, तो क्या यह धर्म है अथवा और कुछ है ? जैसे भी हो. ऐसा पक्षपात अनुचित है ।
( तुम्हारे इस कार्य मे ) वीरता नहीं है । ( शस्त्र मे ) विहित विधि भी नहीं है। वह सत्य में सम्मिलित होनेवाला कार्य भी नहीं है। तुम्हारा स्वत्व बनी हुई इस पृथ्वी के लिए मेरा यह शरीर भारभूत भी नहीं है। मैं तुम्हारा शत्रु भी नहीं हूँ । तो, सद्गुण का त्याग कर ऐसा दया-रहित कार्य तुमने क्यों किया ?
द्विविध कर्मों ( इस लोक के और परलोक के लिए हितकारी कर्म ) का भली भाँति विचार करके, सबके लिए ( अर्थात्, शत्रु. मित्र और तटस्थ—तीनों प्रकार के लोगों के लिए ) समान रूप से उत्तम कार्य करना ही तो धर्म की रक्षा है और उसी में महत्त्व है । अन्यथा पक्षपात से एक को सहायता पहुँचाना क्या धर्म माना जा सकता है और क्या ऐसा करके कोई अपने को दोष से मुक्त रख सकता है ?
तुम्हारी रक्षा को दूरकर ( सीता का ) अपहरण करनेवाले शत्रु ( रावण ) को विनष्ट करने के लिए यदि तुम किसी दूसरे की सहायता पाना चाहते हो, तो तुम्हारा यह कैसा प्रयत्न है कि काले मेघ-जैसे हाथी के प्राण पीनेवाले, क्रोध से उमड़नेवाले सिंह को छोड़कर, तुम एक मगर को अपना साथी बना रहे हो ?
विश्व में विचरण करनेवाले चन्द्र में प्राचीन काल से ही कलङ्क लगा है, कदाचित् यह देखकर ही सूर्य के वंश में तुमने जन्म लेकर उस वंश के लिए भी एक अमिट कलङ्क उत्पन्न कर दिया है ।
युद्ध के लिए किसी दूसरे के आह्वान करने पर मैं यहाँ आया था । तुमने छिप-कर मेरा प्राण-हरण किया । अब जब मैं धरती पर गिरा हूँ, तब तुम दूसरों की दृष्टि में सिंह बनकर यहाँ आ खड़े हुए हो। वाह !
हे प्रतापी वीर ! शास्त्र-विधान की, अपने वंश के पितृ-पितामहों के शील तथा