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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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४८२ | कंब रामायण

उत्तर दिशा का वात, अपने प्रियतमो के विरह में पीडित रहनेवाली तरुणियो के तप्त स्तन-तटो को और भी तपाता हुआ वह चला और उस प्रकार बढ चला, मानो कोई पिशाच हो, जो ( उन स्तनो को ) पुष्ट मांसखंड समझकर उनको काटकर खा डालने के लिए चल पड़ा हो।

बड़े शब्द के साथ धूलि ऊपर उठकर आकाश को रूँधने लगी, बिजलियाँ तीक्ष्ण तलवारो के समान घूम-घूमकर चमकने लगी। मेघ पुष्प-मालाओ से अलंकृत बडे नगाडों के जैसे गरजने लगे। आकाश एक बड़े युद्ध-रंग के समान दृष्टिगत होने लगा।

मधुर मदहास करनेवाली जानकी से बिछुडे हुए रामचन्द्र पर मन्मथ पुष्प-बाण बरसा रहा हो—उसी प्रकार बिजलियो से पूर्ण मेघ-मण्डल उस स्वर्णमय पर्वत पर जल-धाराएँ बरसाने लगा।

जल-धाराएँ मेघों के मध्य-स्थित धनुष से प्रयुक्त शरो के समान वेग से पहाड़ों पर आकर गिरती थी, मेघों से उत्पन्न रक्तवर्ण वज्राग्नि के कण ऐसे गिरे, जैसे रात्रि के समय अत्युज्ज्वल रत्न-कण बरस रहे हों।

योद्धा लोग शत्रुओं के बडे हाथियों पर चमकते हुए बरछे प्रयुक्त कर रहे हो—ऐसे ही मेघ पर्वत पर जल-धाराएँ बरसा रहे थे। उन अवार्य जल-धाराओ के प्रहार से शिलाखड टूट-टूटकर ऐसे लुढक रहे थे, जैसे लाल बिंदियोंवाले उत्तम लक्षण-सम्पन्न गज आहत होकर लुढक जाते हो।

मेघ, मीनकेतन (मन्मथ) था, इन्द्र-धनुष ईख का कमान था, बरसती जल-धाराएँ पुष्प-शर थी, पर्वत की दीर्घ घाटियाँ विरहीजन थी, उन पर्वत-शिलाओ पर जल-धाराएँ यो गिरती थी, जैसे मांसल शरीर में शर चुभ जाते हों।

देवता, यह कहकर कि पवित्र मूर्त्ति ( श्रीराम ) तथा कपिगण दोनो मिलकर अब हमारे शत्रुओं ( रावणादि राक्षसों ) को शीघ्र ही मिटा देंगे गर्जन कर उठे हों—यों मेघ गरज उठे, जल-विन्दु पुष्प-वर्षा के समान बरस पडे।

सुन्दर धनुष धारण करनेवाला राक्षस रावण, जब करवाल लिये हुए ( सीता को ) उठाकर आकाश-मार्ग से त्वरित गति से ले जा रहा था, तब उस नारी-रत्न, आभरण-भूषित देवी (सीता) के नयन जिस प्रकार अश्रुवर्षा करने लगे थे, उसी प्रकार मेघ बरस पडे।

शिर पर चन्द्र को धारण करनेवाले भगवान् ( शिव ) आकाश-मार्ग में उडनेवाले तीनो पुरों को दग्ध करने के लिए अग्निमुखी शर प्रयुक्त कर रहे हों—ऐसी लगती थी चमकती हुई बिजलियाँ, वे सान पर रगड़कर पैनाये गये और चमकते हुए बरछों के समान ही विरह-तप्त पुरुषों के मन को दग्ध कर रही थी, जिससे विरहीजन तडप उठे।

वे वर्षाकालिक संपत्ति का अर्जन करने के लिए दूर देशों मे गये हुए जनों के वियोग मे निष्प्राण बनी हुई विरहिणियों को उनके प्रियतम-रूपी प्राणों को चक्रवाले रथों-पर शीघ्र ला देने थे, अत मूर्च्छा उत्पन्न करनेवाली विरह-व्याधि-रूपी सर्प के विनाश के लिए वे ( मेघ ) गरुड के समान थे ।¹


¹ वर्षाऋतु में प्रवास में गये हुए प्रेमी अपने घर वापस आ जाते हैं, अतः मेघ विरहिणियों का, वियोग में दुःख को दूर करनेवाला, साथी है।— अनु०