भारतकोश
कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary

कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished354 पृष्ठ

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6 KĀNHADAḌE PRABANDHA Verses in DERĀSARĪ'S Edition Corresponding Verses in the Present Edition देवलोकथा तुमी वार देवलोकथा तुमी वार पृथवीहि हुई अवतार ॥ पृथवीइं नही हुई अवतार ॥ ३-२११ डुमरी आवी कूंयरि गुणी कमले आयी डुंयरी सुणी गढ रन्वारी वधामणी ॥ गयउ रवारी बदामणी ॥ ३-२२७ शोभित बूर्ज बूर्ज कांगह सोभित बुर्ज बुर्ज काकरउ ॥ नदी तरुअर फलवा गह ॥ नदी तरुअर उमाहरउ ॥ ४-२५ जाणइ भरह भेद संगीत¹ जाणइ जेह भरहसगीत पाटबंध ते गाइ गीत ॥ पादप्रबंध ते गाइ गीत ॥ ४-५५ राजेगणि सवि ग्या संचरी पहिलउं मंत्र सुपरढु करी पहिलू सवि सहू मेलु करी ॥ राजेगणि सवि ग्या संचरी ॥ ४-१२५ पातसाइइ कासित मोकल्यु पातसाहि कासीद मोकल्यउ मालदे देस मारइ एकलु । मालदेव वीर साहु एकलउ । कमालदीन कहिड सांभलि कमालदीन कहिउं सांभले गढ लीधा विण पाछउ बलि ॥ विण लीधा मत पाछउ वले ॥ ४-१४५ कटक तोरकां ऊपरि सूंडी कटक तोरका ऊपरि सूंडी राउ सींधल दल आव्युं ॥ रासूंघल दल आव्यौ ॥ ४-१७३ उलीधि कर उतारीया उल्हीचइ कर उभारीया वार सहस मूगल मारीया ॥ वार सहस म्लेछ मारीया ॥ ४-२११ खाडा भरत कागरा कोठइ पांडाभरत काकरउ कोठउ इसिउ कही वखाणिउ ॥ इसिउं कही वखाण्यउ ॥ ४-२१३ जेमु लखमण छलभु जाणि जेसल लखमण लूम्वउ जाणि ए नासत नाठा निरवाणि ॥ ए भीसत नाठा निरवाणि ॥ ४-२६३ पूनु, आसुड, वीजड बेड पूनउ आसउ भीजड जेड धारसी नइ ईंपु जेढ ॥ धारसीह नइ दूदउ बेड ॥ ४-२८० वीरमदेवि सुपासण काज वीरमदेव बंश पण काज ऊठ वीहाडा कीधू राज ॥ अठ्ठठ वीहाडा कीधउ राज ॥ ४-२९८ जे फल लहि तापसि सवि जे फल पामइ तपसी सवे जे फल हुइ बंध छोडवि ॥ जे फल हुइ बांद छोडवे ॥ ४-३४० पूर्णिथ सग सवि सजन मलइ प्रेमसंगि सवि सज्जन मिलइ पूर्णिथ आस मनोरथ फलइ ॥ आस मनोरथ सहूइ फलइ ॥ ४-३५२ A critical edition in the strict sense of the the term, of such a monumental epic was, therefore, for long a desideratum. Such an edition would enable scholars to form a correct picture of the language, history and literary achievements of this remarkable period in the history of Gujarāt and Rājasthān. ¹ जाणइ गोतिष, भरह संगीत I₂