कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished354 पृष्ठ
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चतुर्थ खंड १९९ असपति राउ भणइ परधानां, जाई मलिकनइ कहिज्यो । वरस आठ कुंयरी कहीया, तही पाछइ मन रहिज्यो ॥ १७६ आगइ ए गढ कहिउ सदैवत, प्राणइ कांइ न थाइ । ऊपरि चाहूआण सपराणा, लीधउ किमइ न जाइ ॥ १७७ राउल भणइ मालदै प्राणइ जउ थाणउं छंडावइ । कोड आपणउ किम पुहुचिस्यइ, वली कटक नही आवइ ॥ १७८ सीप मोकली राउल कान्हइ, बाहडमेरुं थाणउं । मान्यउ बोल मालदै राइ, जइ द्रउडिउं तुरकाणउं ॥ १७९ आठ वरस मांहि आठज दिहाडा, थाकई करी सजाई । पाछां कटक सहू को चालउ, मलिक सीप फुरमाई ॥ १८० १७६ असपति-अमुपति C. राउ-राय B. भणइ-भणि B, कहि J. परधानां-परघांनां A, परधान B, प्रधाननइँ C, प्रधा