कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)
Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary
कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ खंड १९९ असपति राउ भणइ परधानां, जाई मलिकनइ कहिज्यो । वरस आठ कुंयरी कहीया, तही पाछइ मन रहिज्यो ॥ १७६ आगइ ए गढ कहिउ सदैवत, प्राणइ कांइ न थाइ । ऊपरि चाहूआण सपराणा, लीधउ किमइ न जाइ ॥ १७७ राउल भणइ मालदे प्राणइ जउ थाणउं छंडावइ । कोड आपणउ किम पुहुचिस्यइ, वली कटक नही आवइ ॥ १७८ सीप मोकली राउल कान्हइ, वाहडमेरुं थाणउं । मान्यउ बोल मालदे राइ, जइ द्रउडिउं तुरकाणउं ॥ १७९ आठ वरस मांहि आठज दिहाडा, थाकइ करी सजाई । पाछां कटक सहू को चालउ, मलिक सीप फुरमाई ॥ १८० १७६ असपति-असुपति C. राउ-राय B. भणइ-भणि B, कहि J. परधानां-परघांनां A, परधान B, प्रधोननइ C, प्रधांननि J, प्रधाने K. जाई-जइ A, जई C J K. मलिकनइ-मलिक सविहुंनि A, मलिकनि B, मल्किनि J, मिलिकनइ K. कहिज्यो-कहज्यौ A, कहीया B, कहियो C J, कहजो K. आठ-आठ जे C J K. कुंयरी-कुंयरि B, कुंअरी C, कुंमरीइं J, कुंअरि K, कुंआरी L. कहीया-कहीआ C, कहीयां J, कहिआ K, कहीयइं L. तही-तेहीइ A, तहीं B, तिहा C. पाछइ-पूहइ A, पाठा B, पछी C J,