भारतकोश
कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary

कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished354 पृष्ठ

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प्रधानसंपादकीय प्रास्ताविक वक्तव्य * राजस्थान के सुवर्णसम प्रोज्वल और परम विशुद्ध वीरत्वकी गौरवगाथा गानेवाले, महाकवि पद्मनाभके बनाये हुये राजस्थानी महाकाव्य - कान्हड दे प्रबन्धका, प्रस्तुत संस्करण राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला के ११ वें पुष्प या मणिके रूपमें, राजस्थानी साहित्य और संस्कृतिके सन्मित्र विद्वानोंके करकमलोंमें उपस्थित करते हुये मुझे विशिष्ट आनन्द हो रहा है। राजस्थानके चौहाणकुलशिरोमणि वीर कान्हड दे के, स्वधर्म और स्वदेशकी रक्षाके निमित्त, अनुपम बलिदान करनेकी कीर्तिकथाका, थोडा-बहुत परिचय, भारतीय इतिहासकी प्रायः सभी विशिष्ट पुस्तकोंमें दिया गया मिलता है। वीर कान्हड दे की वीरताको उद्देश्य कर कई आधुनिक लेखकोंने उपन्यास आदिके रूपमें भी कई कथा-कहानियां लिखी हैं। सिनेमा वालोंने इसके विषयमें कोई चित्र तैयार किया है या नहीं इसकी मुझे जानकारी नहीं है। मुसलमानी तवारिखोंमें कई जगह इस वीरके साथ हुई युद्धमयी घटनाओंका उल्लेख मिलता है-परन्तु हिंदुओंके साहित्यमें, केवल प्रस्तुत प्रबन्धके रूपमें ही, एक ऐसी रचना उपलब्ध है जिसके द्वारा हम अपने उस नारायणावतार वीरपुंगवकी कीर्तिकथाका पुण्यश्रवण करने-करानेका सद्भाग्य प्राप्त कर सकते हैं। वीसलनगर नागर ब्राह्मण, महाकवि पद्मनाभ, भारतके एक पुरातन यशोदुर्गका एक सच्चा संरक्षक, उदात्त राष्ट्रप्रेमी, आदर्श राष्ट्रकवि है। वह कवि सचमुच 'पुण्यविवेक' विरुदका धारक था। उसने अपनी कविप्रतिभाके प्रयोगके लिये जिस विषयको पसन्द किया वह वास्तव ही में बडा पुण्य कृत्य था। उसकी 'कविजनरंजनी बुद्धि'ने जिस सत्कविताका सर्जन किया है वह, अन्यान्य हजारों कवियोंकी, लाखों कविताओंसे भी, बढ कर, बहुत उन्नत भाव वाली और बहुत पुण्यदायिनी है। कविको स्वयं इस पुण्य कृतिका अभिमान है। वह स्पष्ट कहता है कि- माइ भारती तणइ पसाइ, अक्षरवंध घट्टिरस थाइ । (४-३४१) माता भारती ही का यह प्रसाद है कि जिसके कारण इस प्रकारके 'अक्षरवन्ध' = काव्य- सर्जन में अपनी बुद्धिका रस रहता है। कविकी यह रचना, कोई क्षुद्र विलासकी या कोई कुत्सित शृंगारकी पोषक, हीन कृति, नहीं है जिसे पढ कर मनुष्यकी मानसिक दुर्बल वृत्तियोंको उत्तेजना प्राप्त हो और जिसके मननसे दुर्विलासकी कुत्सित कामना कुपित हो। यह काव्य तो विशुद्ध धर्मप्रेम, उन्नत राष्ट्रप्रेम, उत्तम सदाचारप्रेम और सात्विक सत्यप्रेमका एक प्रशस्त पुण्य- स्तोत्र है जिसके पढने और सुननेसे, मनुष्यका कल्याण होता है-जीवन पवित्र होता है। और इस लिये इस सत्यकाम कविने, इस प्रबन्धके अन्तमें जो यह कहा है कि- कान्हडचरिय जि को नर भणइ, एक चित्ति जि को नर सुणइ । तीरथफल बोल्युं जेतलुं, पामइ पुण्य सवे तेतलूं ॥ (४-३५१) 'इस कान्हड दे के चरित्रको जो कोई मनुष्य एकचित्त हो कर पढेगा या सुनेगा उसको उन सब तीर्थोंकी यात्रा करने जितना पुण्यफल प्राप्त होगा, जिनका वर्णन ऋषियोंने धर्मग्रन्थोंमें