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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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सातवाँ अध्याय

कर्मयोग का आदर्श

वेदान्त का यह एक बड़ा गम्भीर सिद्धान्त है कि हम भिन्न भिन्न मार्गों से एक ही सर्वाभिमत स्थान पर पहुँच जाते हैं। वे भिन्न भिन्न मार्ग आंशिक रीति पर तो बहुत से हैं, परन्तु उनमें चार मुख्य हैं, जिनमें सब आ जाते हैं। पहला कर्म, दूसरा भक्ति या प्रेम, तीसरा विज्ञान और चौथा ज्ञान। पर तुमको स्मरण रखना चाहिए कि ये मार्ग ऐसे नहीं हैं कि इनका परस्पर एक दूसरे से कुछ सम्बन्ध न हो। ये सब आपस में मिले-जुले हैं। तुम को संसार में ऐसा कोई भी मनुष्य न मिलेगा जो केवल कर्म ही करता हो। न ऐसा ही जन दृष्टि पड़ेगा जो केवल ईश्वर-पूजा और भक्ति में ही अपना सारा समय लगाता हो और न कोई ऐसी ही व्यक्ति मिलेगी जो केवल आत्मिक ज्ञान में ही रमण करती हो और उसको कर्म और भक्ति से कुछ लगाव न हो। यह विभाग केवल अवस्था और अधिकार-भेद से है। हम यह कह चुके हैं कि ये चारों मार्ग मिलकर एक हो जाते हैं। सब धर्म और कर्म के सारे अनुष्ठान और पूजा के सारे अङ्ग एक ही अभिमत स्थान पर पहुँचाने का प्रबन्ध करते हैं।

मैंने तुमको उस अभीष्ट स्थान के समझाने की भी चेष्टा की है। वह केवल मोक्ष है, जिसको स्वातन्त्र्य की पराकाष्ठा कहना