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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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सातवाँ अध्याय

८७

घात कर लें। नहीं, नहीं, इसका मतलब यह है कि हम अपने आप को अस्थिचर्मावनद्ध शरीर न समझें। ममता ही स्वार्थ की जननी है और यही सारे दुःखों का कारण है। यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो “मैं” और “मेरा” इन दो फांसियों को काट दो। यही दो बेड़ियाँ हैं जो मनुष्य को इतनी प्रबल मुक्ति की इच्छा रखते हुए भी बन्धन में जकड़े हुए हैं। बिना इनको काटे तुम स्वार्थ के चक्र से नहीं निकल सकते। कर्मयोग हमको इस बन्धन से छूटने का उपाय बतलाता है और वह केवल स्वार्थ-त्याग है। जब तक स्वार्थ है, तभी तक “मैं” और “मेरा” बने हुए हैं। जहाँ स्वार्थ का नाश हुआ फिर केवल तू और तेरा ही शेष रह जाता है। वही कर्म बन्धन का हेतु है, जिसमें स्वार्थ लगा हुआ है। मैं करता हूँ, अपने या अपनों के लिए करता हूँ, ये संस्कार हैं जो हमको बार बार कर्म-चक्र में घुमा रहे हैं और इससे निकलने नहीं देते। कर्मयोगी यद्यपि कर्म करता है, तथापि वह उसका न अपने को कर्त्ता समझता है और न सम्प्रदान—अधिकारी। उसकी दृष्टि में ईश्वर ही कर्त्ता है और वही सम्प्रदान है। वह अपने को केवल निमित्त मात्र समझता है।

किन्तु यदि तुम आंशिक भेदों और शाखाओं में पड़कर वाद-विवाद करने लगोगे तो फिर इसका समझ में आना कठिन हो जायगा। क्योंकि आस पास की दशाओं और घटनाओं से भेद उत्पन्न हो जाता है। एक कर्म किसी विशेष दशा में निष्काम कहा जाता है, परन्तु दूसरी दशा में वही सकाम बन जाता है। इसलिए हम केवल एक सर्वतन्त्र-सिद्धान्त का पता दे सकते हैं,