कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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लगे। जिन्होंने आरम्भ में इस विश्वास को फैलाया, वे कट्टर और मूर्ख थे। इस समय भी बराबरी और मानुष-अधिकारों के साम्य का उपदेश सुनाया जाता है। यह भी कट्टरपन है। न तो कभी संसार में समता की दशा आई और न कभी आवेगी। भला यह क्योंकर हो सकता है कि इस सृष्टि में, जो प्रकृति के वैषम्य का परिणाम है, सबकी साम्यावस्था हो जावे ! यह सर्वथा असम्भव है। सृष्टि क्यों उत्पन्न होती है ? प्रकृति की साम्यावस्था में भेद पड़ जाता है। आदि में जब यह सृष्टि नहीं बनी थी, प्रकृति साम्यावस्था में थी। उसमें विषमता का आना ही सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है। जब तक यह सृष्टि वर्त्तमान है, उसमें विषमता रहेगी। कल्पना करो, सृष्टि के सारे परमाणु एकही दशा में आजायँ तब क्या इस दशा में सृष्टि का विलोप न हो जायगा ? अवश्य हो जायगा। इसलिए वैषम्य और अनेकता ही सृष्टि के चिह्न हैं। साम्य और एकता प्रलय में जाकर होती है। अब हमको देखना यह है कि मनुष्यों में यह भिन्नता क्यों है। उनके कर्म और संस्कार भिन्न भिन्न होने से हम संसार में भिन्न भिन्न संस्कारों को लेकर उत्पन्न होते हैं। हमारी इच्छायें, आचार, विचार और कर्म भी भिन्न भिन्न होते हैं। फिर हमारी दशा एकसी क्यों कर हो सकती है ? समता मृत्यु है और विषमता ही जीवन है। जब तक यह संसार है, समता हो नहीं सकती। पूरी समता उस समय आवेगी जब यह संसार न रहेगा। संसार में शक्ति-वैषम्य ही एक ऐसी वस्तु है जो मनुष्य को कर्म के लिए प्रेरित करती है। क्योंकि कर्म करने के लिए किसी न किसी उद्देश का सामने होना आवश्यक है