कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 115 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४
कर्मयोग
सकते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि ईश्वर को हमारी सहायता की अपेक्षा नहीं। हमारा उद्देश मुक्ति है और वह निष्काम कर्म से मिल सकती है। "हम संसार का उपकार कर सकते हैं" यह भाव चाहे कट्टर मनुष्यों के लिए अच्छा हो, पर कर्मयोगी को इस से बचना चाहिए। कर्मयोगी के लिए सिवा परमार्थ या मुक्ति के और कोई उद्देश न होना चाहिए। सांसारिक उद्देश चाहे वह कितना ही बड़ा और अच्छा क्यों न हो, उसको नीचे गिरानेवाला है। गीता कहती है "कर्म करने का हमको अधिकार है, पर फल की आशा हमको कर्मयोग के उच्च उद्देश से गिरा देती है।" इसलिए फल की अपेक्षा न करके कर्म करना ही कर्मयोग का आदर्श है। कर्म करो, उसका फल ईश्वर के अर्पण कर दो। यदि फल की इच्छा से कर्म करोगे (चाहे शुभ कर्म ही हो) तो वह तुम्हारे बन्धन का हेतु होगा।
हम संसार नहीं हैं; हम शरीर नहीं हैं, वस्तुतः हम कर्म नहीं करते। हम केवल आत्मा हैं। हम अपने स्वरूप से शुद्ध, शान्त और आनन्दमय हैं। फिर क्यों हम इस कर्म के बन्धन में अपने को जकड़ें। क्यों और किसके लिए शोक और विलाप करते हो। आनन्दमय होकर और आनन्द-धाम में रह कर यह रोना कैसा ! पर हा ! हम लोग तो यहाँ तक अज्ञान और बालकों के समान मूर्ख हो गये हैं कि केवल आप ही नहीं रोते, किन्तु अपने ईश्वर को भी रुलाते हैं। हमारे समान हमारा ईश्वर भी स्वर्ग के सिंहासन पर बैठा हुआ रोया करता है। यह निर्बलता की चरम सीमा है। संसार में आसक्त पुरुष ही अपने प्रिय पदार्थों के वियोग से रोता है। इसलिए तुम बेलाग बनो। स्वार्थ की भावना