कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय
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इस संसार की है। संसार अपनी अवस्था में पूर्ण है। पूर्ण से यह अभिप्राय है कि उसकी आवश्यकतायें किसी व्यक्ति-विशेष या जाति-विशेष पर निर्भर नहीं हैं। हमको विश्वास रखना चाहिए कि चाहे हम कर्म करें या न करें, संसार के काम कभी बन्द न होंगे और उनको हमारी सहायता की कुछ भी आवश्यकता न होगी।
तथापि हमको धर्मात्मा होना चाहिए। धर्म की इच्छा ही हम को सदाचारी बनाती है। यदि हम विश्वास कर लें कि धर्माचरण और दूसरों की सहायता करने का न केवल हमको अधिकार है, प्रत्युत हमारा धर्म है, तो फिर हमें कोई अपने धर्म के पालन से रोक नहीं सकता। जिनकी तुम सहायता करते हो, उन पर अपना अहसान न जतलाओ और न ऋणी के समान उन पर दबाव डालो। किन्तु उनका तुमको स्वयं कृतज्ञ होना चाहिए कि उनके कारण तुमको अपनी उदारता के चरितार्थ करने का अवसर मिला। उनकी सहायता करने से वास्तव में तुमने अपनी सहायता की है, क्योंकि गृहीता से अधिक दान का लाभ दाता को मिलता है। तुम उनका धन्यवाद करो कि उनके कारण तुम धर्मात्मा और दानी कहलाने के अधिकारी बने और तुमको अपने अन्तःकरण के पवित्र और उदार बनाने में सफलता प्राप्त हुई। स्मरण रक्खो, जितने शुभ कर्म तुम करोगे, उतना ही तुम्हारा हृदय पवित्र होगा। चिकित्सालय बनाकर रोगियों की सहायता करो, दीनालय और अनाथालय खोल कर दीनों और अनाथों का भरण-पोषण करो। विद्यालय स्थापन करके सर्व-साधारण को शिक्षित बनाओ। इनको और ऐसे ही लोकोपकार के अन्य कार्यों को भी उत्साह और प्रेम