कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ७१
को तुम उसी दृष्टि से देखा करो, जिस दृष्टि से उनकी धात्री (दाया) उनको देखा करती है। दाया तुम्हारे पुत्र को गोद में लेकर खूब खिलावेगी और प्यार करेगी, परन्तु जहाँ तुमने उसको अलग किया, वह उसी समय अपना डेरा डंडा उठा कर चल देगी और उसको तुम्हारे घर से कुछ भी सम्बन्ध न रहेगा, सब कुछ भूल जायगी और लड़कों के वियोग से उसे कुछ भी दुःख न होगा। यदि तुम सोचो तो अपने ही लड़कों के साथ तुम्हारी भी यही दशा है। यदि ईश्वर पर तुम्हारा विश्वास है तो ये सारे पदार्थ जो तुमको प्राप्त हुए हैं, सब उसी के हैं। तुम्हारा इन पर कुछ भी अधिकार नहीं। न तुम किसी की सहायता करते हो और न किसी को तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। जिसने यह जगत् बनाया है और जो इन सब पदार्थों का वास्तविक स्वामी है वही हमारी, तुम्हारी, सबकी सहायता कर रहा है। तुमको केवल दूसरों की सहायता करने का अधिकार सौंपा गया है और यह कैसा पवित्र अधिकार है। इससे हमको प्रसन्नता होती है और शिक्षा मिलती है। वह शिक्षा जो हमको और तुमको इस संसार में सीखनी है और जिस समय हमने उसको भली भाँति समझ लिया, फिर हम इस संसार में कभी दुःखी न होंगे। हम चाहे जिस समाज में रहें, जो काम करें, हमको कोई हानि न पहुँचा सकेगा। तुम्हारी स्त्री हो, पति हो, माता-पिता हो, पुत्र वा पुत्रियाँ हों, नौकर-चाकर हों, बड़े बड़े पद और कार्य्य-भार हों, यदि तुम इस सिद्धान्त पर काम करो अर्थात् संसार के होकर न रहों तो तुमको कभी क्लेश न होगा। तुमको बहुत से मित्रों का