कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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है। जिस वस्तु को हम जानते हैं, या जिसका जानना सम्भव है वह उस प्राकृत नियम के अधीन है, जिसके द्वारा हम अपने मन और इन्द्रियादि से काम लेते हैं और जहाँ अधीनता है, वहाँ "स्वतन्त्रता" इस शब्द का प्रयोग करना भी अनुचित है। परन्तु वह वस्तु जिसने देश, काल और निमित्त के संयोग से अपनी दशा और शक्ति में परिवर्तन स्वीकार किया है, जो पहले सम्पूर्ण शक्तियों का केन्द्र था और अब भी है (चाहे प्रकृति के आवरण ने कुछ काल के लिए उन शक्तियों को दबा दिया हो) स्वरूप से मुक्त (पूर्ण स्वतन्त्र) है। उसमें तभी तक यह बन्धन है जब तक देश, काल और निमित्त का संयोग है। जहाँ यह संयोग मिटा वहाँ वह फिर शुद्ध बुद्ध और मुक्त है। वह मुक्ति से आकर बन्धन में पड़ा है, बन्धन से छूट कर फिर मुक्त हो जाता है।
यह प्रश्न उपनिषदों में आता है कि यह संसार कहाँ से उत्पन्न हुआ, किसमें रहता है और कहाँ जायगा। इस का यह उत्तर दिया गया है कि वह मोक्ष से आता है, बन्धन में रहता है और फिर मोक्ष को चला जायगा। अतएव जहाँ कहीं और जब कभी हम मनुष्य का वर्णन करते हैं, वहाँ और तब हमारा यह अभिप्राय होता है कि यह मनुष्य उस अनन्त, अखण्ड और सर्वव्यापक सत्ता का एक अंश है। यह ब्रह्माण्ड स्वयं उस अनन्त सत्ता में एक बिन्दु की उपमा रखता है। हमारे कर्म और उनके फल, इच्छायें और आशायें सब इसी ऐन्द्रिय-जगत् से सम्बन्ध रखते हैं और हमारी उन्नति और अवनति भी इसीके भीतर हो रही है। यह आशा करना कि यह जगत् सदा रहेगा एक बाल-चेष्टा है। इसके