भारतकोश
कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 115 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

छठा अध्याय

८५

और अणु से लेकर सूर्य्य तक सब कर्म कर रहे हैं। कोई एक क्षण भर के लिए भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। यह कर्म क्यों हो रहा है? मुक्ति के लिए। सब मुक्ति चाहते हैं और बन्धन से भागते हैं। संसार में दो प्रकार की शक्तियाँ काम कर रही हैं। एक आकर्षक, दूसरी विकर्षक। आकर्षक शक्ति वह है कि जो हमें मुक्ति की ओर खींच रही है और विकर्षक शक्ति वह है, जो हमें बन्धन से हटा रही है।

कर्मयोग हमें क्या सिखाता है? कर्म किस प्रकार करना चाहिए? यही कर्मयोग की शिक्षा है। जो इस विद्या को नहीं जानता, वह सदा संसार की चक्की में पिसता रहता है। कर्मयोग ही से हम कर्म के रहस्य को समझते हैं। इसी से कर्म के बन्धन को, जिस प्रकार काँटे से काँटे को और विष से विष को दूर करते हैं, शिथिल कर सकते हैं। यदि हम कर्मयोग को नहीं जानते तो कर्म करने में हमारी शक्ति का दुरुपयोग ही नहीं होता, किन्तु वह कर्म और भी हमारे बन्धन को दृढ़ कर देता है। कर्मयोग कर्म का सायन्स है, इससे तुम सीख सकते हो कि किस प्रकार कर्म करने से उसका फल शीघ्र और तुम्हारे अनुकूल हो सकता है। कर्म करना आवश्यक है, तथापि हमको किसी श्रेष्ठ उद्देश को सम्मुख रख कर कर्म करना चाहिए। कर्मयोग हमको बतलावेगा कि यह संसार परिवर्तनशील है, इसमें स्थायी सुख नहीं है। यह उस स्थान तक हमको पहुँचाने के लिए (जहाँ निराबाध सुख है) एक मार्ग (सड़क) है। हमको धीरे धीरे बल और अधिकार प्राप्त करते हुए इस सड़क से जाना है। संसार में शुकदेव जैसे मनुष्य बिरले ही होते