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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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छठा अध्याय

सिंहासन पर बैठा हुआ संसार से विरक्त हो, दूसरा चिथड़ा लपेटे हुए साधुवेश में पूरा संसारी हो। कर्म-योग का यथार्थ उपयोग हम को वैराग्य का अधिकारी बनाता है।

कर्मयोग में वैराग्य दो प्रकार का है। एक उन लोगों के लिए है, जो ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते और न किसी प्रकार की बाह्य सहायता की अपेक्षा रखते हैं। वे अपने बाहुबल पर भरोसा रखते हैं और अपनी प्रबल मानसिक शक्ति से बहु-विध ऐश्वर्य और अधिकारों के स्वामी होने पर भी कहते हैं कि “मैं बेलाग रहूँगा”। ऐसे लोग अपने अनुभव और विवेक के अनुसार काम करते हैं। जो लोग ईश्वर-भक्त हैं, उनके लिए वैराग्य का दूसरा मार्ग है और जो पहले की अपेक्षा कठिन नहीं है। वे अपने कर्म-फल को ईश्वरार्पण करते हैं। वे कर्म अवश्य करते हैं, पर उसके फल की इच्छा नहीं रखते। वे जो कुछ करते, देखते और सुनते हैं, वह सब ईश्वर के लिए है। यदि कोई अच्छा काम हम करें तो हमको उसका अभिमान न करना चाहिए और न प्रशंसा की आशा रखनी चाहिए। क्योंकि हम उसका फल ईश्वर के अर्पण कर चुके हैं या हमको यह समझना चाहिए कि हमने कुछ भी काम नहीं किया है। जैसे कोई नौकर अपने स्वामी के लिए काम करता है और वह स्वामी का ही काम कहलाता है और वही उसके यश का भागी भी होता है; सेवक को कोई जानता भी नहीं, वैसे ही हम उस ईश्वर के सेवक और उपासक हैं। हम काम करने के निमित्त मात्र हैं। प्रेरक व नियोजक हमारा वही है। हम सेवक-वत् उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, इसलिए हमारा उस पर