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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

कर्मयोग १०५

को हृदय से निकाल कर शुभ कर्म करते रहो, तुम्हारे सारे बन्धन अपने आप टूट जावेंगे। प्रत्येक शुभ सङ्कल्प, शुभ उपदेश और शुभ कर्म, जो फल की प्रत्याशा से रहित होकर किया जाता है, इस बन्धन के दृढ़ पाश को (जिसमें बँधे हुए हम अपने को दीन, असमर्थ और दुःखार्त्त समझ रहे हैं) छिन्न भिन्न कर सकता है।

अब मैं एक बात कह कर अपने इस कथन को समाप्त करता हूँ। संसार में एक बहुत बड़ा कर्मयोगी हुआ है, उसका नाम बुद्ध था। संसार के सारे अवतार और पैग़म्बर किसी न किसी प्रयोजन या उद्देश से काम करते थे, पर बुद्ध इन सब से विलक्षण था। संसार में दो प्रकार के पैग़म्बर हुए हैं। एक तो वे जो अपने आप को ईश्वर का अवतार मानते थे। दूसरे वे जिन्होंने अपने को ईश्वर का दूत (रसूल) प्रकट किया। यद्यपि उन सब के उपदेशों और चरित्रों में बहुत से आध्यात्मिक उच्च-भाव और आदर्श मिलेंगे तथापि यह सिद्ध है कि उन्होंने बाह्य उद्देशों को अपने सामने रख कर काम किया। केवल बुद्ध ही ऐसा मनुष्य था जिसका यह कथन है कि "मुझको ईश्वर के विषय में ज्ञान प्राप्त करने की कुछ भी आवश्यकता नहीं। आत्मिक गूढ़ सिद्धान्तों पर वाद-विवाद करने की आवश्यकता क्या है? शुभ कर्म करो, धर्मात्मा बनो, तुमको इसी से मुक्ति और सच्चाई मिलेगी।" वह अपने पवित्र और उच्च-भावों का मूर्त्तिमान् चित्र था। उसमें स्वार्थ का लेश नहीं था, न उसका कोई जातीय वा सामूहिक उद्देश था। संसार में किसने उससे अच्छा या अधिक काम किया है? इतिहास में कोई व्यक्ति ऐसी दिखाई नहीं पड़ती, जिसने संसार पर अपना इतना आश्चर्य-

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कर्मयोग

मय प्रभाव डाला हो। मनुष्य-जाति में यह एक अपूर्व उदाहरण है। ऐसी उच्च फ़िलासफ़ी और ऐसी प्रबल संवेदना और सहानुभूति आपको और कहाँ दीख पड़ती है? यह ऐसा उच्चमनस्क दार्शनिक हुआ है, जिसके गूढ़ विचार और उच्च सिद्धान्तों में काल्पनिक और विवादास्पद विषयों की मीमांसा या विवेचना मिलेगी। किन्तु मनुष्य की स्वभाव-सुलभ और अनुभव-सिद्ध जो बातें हैं, उन्हीं का विवेचन प्रबल युक्तियों के द्वारा इस महात्मा ने किया है। क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी के साथ भी उसकी सहानुभूति थी। उसने सब के साथ दया-भाव प्रकट किया। जब तक जिया, दूसरों के कष्ट-मोचन और दुःख-निवारण में लगा रहा, पर अपने लिए किसी फल का इच्छुक नहीं हुआ। यही कर्मयोग का उच्च आदर्श है। इसमें न कोई स्वार्थ है और न निज का कोई उद्देश है। इतिहास पुकार पुकार कर कह रहा है कि बुद्ध जैसा निःस्वार्थ, त्यागी, सच्चा कर्मयोगी, महापुरुष संसार ने अब तक उत्पन्न नहीं किया। वह पहला मनुष्य था, जो कहा करता था कि "प्राचीन पुस्तकों की आज्ञाओं पर केवल उनके प्राचीन होने के कारण विश्वास न करो, अपने जातीय सिद्धान्तों पर केवल जातीयता के विचार से विश्वास न करो; किन्तु उनको बुद्धि की तुला पर तोल कर देखो, तर्क और युक्ति की कसौटी में परखो। यदि उनमें भलाई और सच्चाई है तो स्वीकार करो और उन पर विश्वास करो, और उन्हीं के अनुसार अपना जीवन बनाओ। अपने मन, वचन और कर्म को एक बनाओ और उनके द्वारा दूसरों की सहायता करो।" बस, यही गौतम-बुद्ध की शिक्षा है और यही कर्मयोग का सब से उच्च आदर्श है।

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CC-0. In Public Domain. Funding by IKS-MoE

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