कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Karpuramanjari Sattaka of Rajasekhara with Commentary
महाकवि राजशेखर द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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| अ० | श्लो० | अ० | श्लो० | |
|---|---|---|---|---|
| कृत्ये जगत्त्रतां न मेदिनी | १ | ७७ | यः पीयूषभुजां पुरः प्रह० | १ |
| धनुर्विद्यारहस्येषु शिष्योऽयं | १ | ६१ | यः सत्त्वस्य निधिः श्रियां | १ |
| धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे | १ | १८ | यदुत्सिमुदामुद्द्र्धैर्यायी | १ |
| धार्ते द्रुपदजाम्बरं | १ | ४५ | यद्यहं हारिता पूर्वं भवामि | २ |
| दृष्ट्वा पुत्रं विपण्णे हसति सु० | १ | ७३ | यन्मुक्तः स्फारतारध्वनि० | २ |
| ध्रुवमिदमुरदिष्टं कैश्चिदा० | १ | ८० | यस्मिन्मदस्य मदनस्य ... | १ |
| नकुलोऽपि ते भ्रातृभ्रांता | २ | ३२ | यागकुण्डशिरिगर्भसंभवं | १ |
| नमत्कण्ठपाडनत्रुटितकीक० | १ | ५२ | यात्राहूतोऽद्य चतुरहच० | १ |
| नमः शिवाय संसारसरो ० | १ | १ | यां मे यलः स वलवान्दलि | २ |
| मित्रमुकुटमौलिः पाकलो० | १ | ७ | यावन्नैकं द्रुपददुहितुः कृ० | २ |
| नाले शीर्यन्महोत्पलस्य धि० | २ | १९ | युधिष्ठिरो धर्ममयो महा० | २ |
| निरर्गलविनिर्गलत्तुलगुलाक | २ | ३९ | येनेयं याज्ञसेनी नृपसदसि | २ |
| निर्दिशन्तु निजबाहुविक्रमं | १ | ५१ | ये विद्यापरमेश्वराः स्तुव० | १ |
| निर्वद्धान्नरजीवपिण्डकरणै | १ | २३ | ये सीमन्तितवाग्रभसराज | १ |
| निर्वान्ति यस्य वदनाद्दि० | २ | २५ | योगीन्द्रश्छन्दसां द्रष्टा रा० | १ |
| नीलाम्बरं नलिनदाम च | १ | ५३ | यो भार्गवाद्भगवतोऽर्जित | २ |
| न्यस्तं सान्द्रवितुषु चक्षुर० | १ | ३६ | यो मन्थानकरः शमी निज० | २ |
| न्यायवादी विकर्णोऽत्र | २ | ४४ | यौवराज्याभिषेकार्हो वीरो | १ |
| पञ्चानां या कलत्रं द्रुपदम० | २ | १७ | रणन्मणिनूपुरा रणरजश्छ० | २ |
| पाणिप्रस्थंयंकुलसुमनःसौरभं | १ | ६५ | राजन्युधिष्ठिर नराधिप ... | २ |
| पादो यासम्वि सान्द्रकुङ्कुम० | १ | ५० | राजशेखरकवेर्महात्मनो | १ |
| प्रथयति पात्रविशेषगतामा० | १ | १४ | राजगूयक्रतोर्यज्वा पाण्डवो | २ |
| प्रसर्पतु रणाङ्गणे रुधिरवेदि | १ | ८९ | राजसूयक्रतोर्यज्वा पाण्डु | २ |
| बभूव यस्मीन्नभयः पुरा | १ | १२ | राजावतीक्ष्णमायानो राज० | २ |
| महाभ्यः शिवमस्तु वस्तु | १ | रे रे माहाण मुञ्च विस्रवम | १ | |
| महाद्युष्ययुगपन्नितमातत | १ | ७६ | रेवती त्रिभुवनैकमन्दरी न | १ |
| मतीधरापराशु ये मनिनदं | १ | २१ | लक्ष्मी संवननैर्भुजैर्नृपतयः | १ |
| मायामये मयसभाधिमन्ते | २ | ९ | वर्षाणि द्वादशारण्ये मह | २ |
| वंशद्याणगुणैर्णांकरणग्रहमु० | १ |