काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)
Kasika Vritti of Vamana and Jayaditya on Panini Sutras
आचार्य वामन एवं जयादित्य (सम्पादक: पण्डित बालशास्त्री) द्वारा
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८१२ ॥ काशिका ॥ ८ ॥ ४ ॥ क्षीरपेण। सुरापेण। ण इति वर्तमाने पुनर्ब्रहणं विकल्पाधिकारनिवृत्तेर्वि- स्पष्टीकरणार्थम् ॥ कुमति च ॥ १३ ॥ कवर्गवति चोत्तरपदे प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु पूर्वपदस्थान्निमित्तादु- त्तरस्य नकारस्य णकारादेशो भवति। वस्त्रयुगैणौ। वस्त्रयुगिणः। स्वर्गका- मिणौ। वृषगामिणौ। नुमि। वस्त्रयुगाणि। खरयुगाणि। विभक्तौ। वस्त्र- युगेण। खरयुगेण ॥ उपसर्गादसमासेपि णोपदेशस्य ॥ १४ ॥ ण उपदेशे यस्यासौ णोपदेशः। णोपदेशस्य धातोर्यो नकारः तस्य उपसर्गस्थान्निमित्तादुत्तरस्य णकारादेशो भवति असमासेपि समासेपि। प्रणमति। परिणमति। * प्रणायकः। परिणायकः। उपसर्गादिति किम्। प्रयता नायका अस्माद्देशात्। प्रनायको देशः। असमासेपीति किम्।