भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

को पहुँचने में एक अहोरात्र लगता है अर्थात् अन्येद्युष्क का स्थान छाती है। छाती से आमाशय तक दोष के पहुंचने में एक अहोरात्र लगता है। इसलिये अन्येद्युष्क का वेग २४ घण्टे में होता है। तृतीयक का स्थान कण्ठ माना गया है। कण्ठ से छाती तक एक अहोरात्र तथा छाती से आमाशय तक पहुंचने में दूसरा अहोरात्र लगता है इसलिये तृतीयक का वेग तीसरे दिन होता है। इसी प्रकार चतुर्थक का स्थान सिर है। उसे आमाशय तक पहुंचने में तीन अहोरात्र लगते हैं अर्थात् चतुर्थक का वेग चौथे दिन होता है। इनके अतिरिक्त विषमज्वर का कोई स्थान नहीं है इसलिये चौथे दिन के बाद इसका कोई वेग नहीं होता है। यह अत्यन्त युक्तिसंगत उत्तर दिया गया है। इसी प्रकार अन्य भी बहुत से नवीन विषय इस संहिता में दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार संपूर्ण दृष्टियों से कौमार-भृत्य के विषय में यह एक पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना जा सकता है। अनेक वर्षों से मेरी इच्छा इसके अनुवाद करने की थी। चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय के व्यवस्थापकों के सत्रयत्नों से उस इच्छा को पूर्ण करने का अवसर मुझे उपलब्ध हो गया। इस ग्रन्थ के साथ राजगुरु हेमराज जी ने जो एक अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण एवं सारगर्भित उपोद्घात लिख दिया है उससे तो इस ग्रन्थ की उपादेयता और भी बढ़ गई हैं। इसमें आयुर्वेद का विस्तृत इतिहास एवं विकासक्रम दिया गया है तथा आयुर्वेद के प्रधान ग्रन्थों एवं उनके आचार्यों का भी विस्तृत विवेचन किया गया है। परन्तु यह उपोद्घात संस्कृत भाषा में लिखा होने से आयुर्वेद के अनेक ऐसे प्रेमी, जो संस्कृत से अनभिज्ञ हैं; इससे विशेष लाभ नहीं उठा पाते, इसी लिये इस संहिता के अनुवाद का प्रश्न जब मेरे सामने आया तो मूल ग्रन्थ के साथ-साथ उपोद्घात का अनुवाद करना भी मैंने आवश्यक समझा, इससे यद्यपि ग्रन्थ का कलेवर अवश्य बढ़ गया है परन्तु इससे इसकी उपयोगिता निर्विवाद बढ़ गई है।

पूज्य हेमराज जी ने सहर्ष अत्यन्त उदारतापूर्वक प्रकाशक को सानुवाद उपोद्घात छापने की स्वीकृति प्रदान कर दी इसके लिये मैं तथा प्रकाशक उनके अत्यन्त आभारी हैं। चौखम्भा संस्कृत पुस्तकालय के व्यवस्थापक श्री जयकृष्णदास हरिदासजी गुप्त भी अत्यन्त धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इस महान् अर्थ-संकट काल में भी आर्थिक लोलुपता से विरत होकर सेवाभाव से ही इस ग्रन्थ का प्रकाशन कर आयुर्वेद जगत् की एक महान् क्षति की पूर्ति कर दी है। श्री अत्रिदेव जी गुप्त का मैं अत्यन्त आभारी हूँ, उन्हीं की निरन्तर प्रेरणा का फल है कि मैं आप लोगों के सम्मुख इसका अनुवाद उपस्थित कर सका हूँ, उनको मैं धन्यवाद तो नहीं दे सकता क्योंकि वे मेरे गुरु हैं। काश्यपसंहिता का अनुवाद करना मेरे लिये सरल नहीं था क्योंकि यह एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है जिसमें स्थान-स्थान पर अनेक विषय एवं शब्द ऐसे आये हुए हैं जो बिलकुल अप्रसिद्ध एवं अस्पष्ट हैं। इनके अतिरिक्त सबसे अधिक कठिनाई जो थी वह कि यह ग्रन्थ स्थान-स्थान पर खण्डित अवस्था में है। इन कठिनाइयों के होते हुए भी प्रकाशक के द्वारा निरन्तर प्रोत्साहन मिलते रहने से ही मैं इस कार्य को पूर्ण कर सका हूँ अतः मैं उनका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ।

इस संहिता के अनुवाद कार्य में मुझे बहुत से व्यक्तियों से अत्यन्त अमूल्य सहायता प्राप्त हुई है उनको मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। गुरुकुल आयुर्वेद महाविद्यालय के वयोवृद्ध उपाध्याय श्री कविराज हरिदास जी शास्त्री न्यायतीर्थ का मैं अत्यन्त आभारी हूँ जिनसे मुझे समय-समय पर बहुमूल्य सहायता मिलती रही है। श्री पं. हरिदत्त जी वेदालङ्कार, श्री पं. रामनाथ जी वेदालङ्कार तथा श्री पं. शंकरदेव जी विद्यालङ्कार को भी मैं धन्यवाद देता हूँ इनसे मुझे हर प्रकार की सहायता प्राप्त होती रही है। ऋषिकुल आयुर्वेद कालेज के विद्यार्थी ऋषिप्रकाश को भी हम धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकते जिन्होंने हमारे इस कार्य में अत्यन्त सहयोग प्रदान किया। अन्त में मुझे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सुशीलादेवी को भी अवश्य धन्यवाद देना चाहिये जिनकी आत्मिक सहायता एवं इच्छाशक्ति के बिना यह कार्य पूरा नहीं हो सकता था।

अन्त में हिन्दी अनुवाद के विषय में मैं इतना अवश्य कह देना चाहता हूँ कि इस संहिता में कुछ ऐसे विषय आये