भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 466
१०८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

विण्मूत्रकृमिपक्वामकफपित्ताशयाः पृथक् ।। सन्त्येते देहिनां कोष्ठे स्त्रिया गर्भाशयोऽष्टमः ।। ९ ।।
शुक्रमज्जास्थि पितृतो मातृत्तो मांसशोणितम् ।। षट्कोशं प्रवदन्त्येके देह० ........ ।। १० ।।
....................... । ........................ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ८१ तमं पत्रम्¹ ।)

गर्भ के शोणित (रक्त) से हृदय बनता है, हृदय से यकृत्, यकृत् से प्लीहा, तथा प्लीहा से फुफ्फुस (Lungs) बनते हैं। हे भार्गव (भृगुकुल में उत्पन्न जीवक) ! ये सब अङ्ग परस्पर संबद्ध होते हैं। इनके नीचे जरायु से युक्त तथा कुण्डलिनी चक्र में स्थित एक बड़ा स्रोत होता है जिसे गर्भाशय कहते हैं। (स्त्रीणां तु बस्तिपार्श्वगतो गर्भाशय इति सुश्रुतः)। इसमें आमाशय, पक्वाशय तथा अन्न एवं पान का आश्रय गुदा स्थित होती है। उससे बस्ति (श्रोणि गुहा—Pelvis cavity) बनती है जो स्राव से पूरित होती रहती है। इसके नीचे धमनीमुख संस्थान एवं स्त्रोतस् होते हैं। मनुष्यों के कोष्ठ में मल, मूत्र, कृमि, पक्व, आम, कफ तथा पित्त के आशय (स्थान) पृथक् २ होते हैं। तथा स्त्रियों के कोष्ठ में इनके अतिरिक्त आठवां गर्भाशय भी होता है। पिता के अंश से गर्भ में शुक्र, मज्जा तथा अस्थियां बनती हैं और माता के अंश से मांस और शोणित बनते हैं। कुछ लोग देह में ६ कोश बताते हैं ........ ।।५-१०।।

**वक्तव्य—**यह अध्याय यहीं (मध्य में ही) समाप्त हो गया है। इसलिये विषय का पूर्ण ज्ञान होना कठिन है। उपलब्ध विषय से ही सन्तोष करना पड़ता है।


शरीरविचयशारीराध्यायः

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(द्वात्रिंशत्त मता दन्तास्तावन्त्यू) खलिकानि च।
पाणिपादाङ्गुल्यास्थीनि षष्टिः स्युर्विंशतिर्नखाः।
पाणिपादशलाकास्तु विंशतिः परिकीर्तिताः।
पाणिपादशलाकानामधिष्ठानचतुष्टयम् ।
द्वे पाष्ण्यो॑रस्थिनी कूर्चाश्चत्वारः पादयोः स्मृताः।
द्वावेव हस्तमणिकौ चत्वार्याहुररत्निषु।
जान्वस्थिनी द्वे संख्याते चत्वार्यस्थीनि जङ्घयोः।
द्वावूरुनलकौ द्वे च ख्याते जानुकपालिके।
द्वावंसावंसफलकावपि द्वावेव चाक्षकौ।
द्वे बाहुनलके द्वे द्वे श्रोणितालूषके तथा।
एकं जत्रु भगास्थ्येकं ग्रीवा पञ्चदशास्थिकी।
भार्गवाऽस्थीनि पृष्ठ्यानि चत्वारिंशच्च पञ्च च।


१. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके।