काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] |
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अतः परं तु मांसानां रसपाकविशेषणम्। वक्ष्ये गुणविशेषं च वृद्धजीवक ! तच्छृणु ।।१९।।
हे वृद्धजीवक ! अब मैं मांसों के रस एवं पाक की विशेषता तथा उनके विशेष गुणों का वर्णन करूंगा। इसे तुम सुनो ।।
कफपित्तकरं मांसं गवां वाते हितं गुरु। विदाहि बृंहणं चैव, खङ्गमांसं च तत्समम् ।।२०।।
गौ का मांस—गौ का मांस कफ तथा पित्तकारक, वातरोगों में हितकर, गुरु, विदाहि एवं बृंहण होता है। गैंडे का मांस—यह भी गौ के मांस के ही समान होता है ॥२०॥
न्यङ्कूनां विहितं वाते कफपित्तहरं लघु। सक्षारं दान्तिनं मांसं बृंहणं कटुतिक्तकम् ।।२१।।
वीर्येणोष्णं च तद्विद्यात् कफपित्तं करोति च।
शम्बर मृग (बारहसिंगे) का मांस—शम्बर मृग का मांस वातरोगों में हितकर है तथा यह कफ—पित्तहर एवं लघु है। हाथी का मांस-हाथी का मांस क्षारयुक्त, बृंहण, कटु एवं तिक्त होता है। यह वीर्य में उष्ण होता है तथा कफ और पित्त को बढ़ाता है ॥२१॥
गोकर्णमांसं तत्तुल्यं गवयस्थ रुरोरपि ।।२२।।
गोकर्ण (मृगभेद), गवय (गलकम्बल से शून्य गौ के समान पशु-नील गाय) तथा रुरु (मृगभेद) का मांस भी हाथी के मांस के समान ही होता है ॥२२॥
रसे पाके च मधुरं वातपित्तहरं गुरु। उष्णं चैव च्छागमांसमाविकं चापि तद्गुणम् ।।२३।।
अजा का मांस—अजा (बकरे) का मांस रस एवं विपाक में मधुर, वात पित्त नाशक, गुरु तथा उष्ण है। भेड़ का मांस—भेड़ के मांस-भेड़ के मांस के गुण बकरे के मांस के समान ही है ॥२३॥
वृष्यं तु मांस वाराहं मधुरं गुरु पच्यते। तद्गुणं माहिषं विद्धि, शौकरं स्यात्ततो गुरु ।।२४।।
सूअर का मांस—सूअर का मांस वृष्य, मधुर तथा गुरुपाकी होता है। भैंस का मांस—भैंस के मांस के वे ही गुण हैं जो सूअर के मांस के हैं। सूअर का मांस इससे गुरु होता है ।।
गर्दभस्य तथाऽश्वस्य मांसं यत् पृषतस्य च। कफघ्नं वातलं रूक्षं कटुतिक्ताह्वयं लघु ।।२५।।
गदहा, घोड़ा तथा पृषत (जिसके शरीर पर चित्र विचित्र बिन्दु होते हैं ऐसा चित्तल मृग) नामक हरिण का मांस-कफनाशक, वातकारक, रूक्ष, कटु, तिक्त एवं लघु होते हैं ।।
श्वदंष्ट्रो वृषदंष्ट्रश्च ऋष्यः शरभ एव च। वातघ्ना उष्णवीर्याश्च रसत: कटुकान्वया: ।।२६।।
गोलाङ्गूला वानराश्च तत्तुल्या मधुरोत्तराः ।
श्वदंष्ट्र (चार दांत वाला एक मृग), वृषदंष्ट्र (रान का बिलाव), ऋष्य (नीले अण्डकोश वाला रोहू मृग) तथा शरभ (महासिंह नामक काश्मीर देशीय हरिण विशेष—अष्टापद उष्ट्रप्रमाणो महाशृङ्गः पृष्ठगतचतुष्पादः काश्मीरे प्रसिद्ध) का मांस वातनाशक, उष्णवीर्य तथा रस में कटु होता है। गोलाङ्गूल (बन्दर की जाति) तथा वानरों का मांस-इन्हीं के समान है परन्तु इनमें कुछ मधुर रस की अधिकता होती है ॥२६॥
वृकर्क्षकोकजम्बूकाः सिंहा व्याघ्रतरक्षवः ।।२७।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)