भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

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५५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

गुरवः प्राणिनो बाला, युवानो वृष्यबृंहणाः ।।६२।।
वृद्धास्तु वातला रूक्षाः, पुंभ्यस्तु लघवः स्त्रियः ।
मृगाल्लघुतरः पक्षी, पक्षिभ्योऽम्बुचरो गुरुः ।।६३।।

बाल (छोटे) प्राणी गुरु माने गये हैं, युवा प्राणी वृष्य तथा बृंहण होते हैं तथा वृद्धप्राणी वातकारक एवं रूक्ष होते हैं। पुरुषों (Males) की अपेक्षा स्त्रियां (Females) लघु होती हैं। मृगों (पशुओं) की अपेक्षा पक्षी लघु होते हैं तथा पक्षियों से जलचर प्राणी गुरु होते हैं ॥६२-६३॥

महाशरीराश्चल्पकाया लघवो जीवक ! स्मृताः । विज्ञेयाश्चाल्पभुग्भ्योऽपि गुरवो बहुभोजनाः ।।६४।।

हे जीवक ! (नकुल मूषिक आदि) अल्प शरीरवाले प्राणियों में बड़े और मोटे प्राणियों का मांस लघु होता है । अल्पभुक् (थोड़ा खानेवाले) प्राणियों में अधिक भोजन करनेवाले प्राणी गुरु होते हैं ॥६४॥

लघवोऽल्पभूमिचरा, अलसेभ्यो विदूरगाः । लघुदेशचरा अल्पा लघवो लघुभोजनाः ।।६५।।

अल्पभूमिचर (थोड़ा चरने वाले) प्राणी लघु होते हैं । आलसी प्राणियों में बहुत दूर तक जाकर चरने वाले प्राणी लघु होते हैं तथा लघु देश में चरने वाले, अल्प शरीर वाले एवं लघु भोजन करने वाले प्राणी भी लघु होते हैं ॥६५॥

गुरुदेशचराः स्थूला गुरवो गुरुभोजनाः । पाशबद्धं गुरु मांसं रूक्षं क्षुद्व्याधिभिर्हतम् ।।६६।।

गुरु (भारी) देश (स्थान) में विचरने वाले, स्थूल तथा गुरु भोजन करने वाले प्राणी गुरु होते हैं। जाल में पकड़े हुए प्राणियों का मांस गुरु होता है। क्षुधा (भूख) एवं रोग से मरे हुए प्राणी का मांस रूक्ष होता है ॥६६॥

श्वभिर्हतं पीतरक्तं नातिबृंहणमुच्यते । विषैर्हतमभक्ष्यं स्याच्छुष्कं नातिगुणावहम् ।।६७।।

कुत्तों द्वारा मारे हुए तथा जिसका रक्तपान कर लिया गया है ऐसे प्राणियों का मांस अधिक बृंहण नहीं होता है। विष द्वारा मारे हुए प्राणियों का मांस अभक्ष्य होता है। वह शुष्क तथा गुणहीन होता है ॥६७॥

सद्योऽपरिक्लिष्टहतं मांसं धातुं विवर्धयेत् । पूतिमांसं गुर्वसारं तदवृष्यमबृंहणम् ।।६८।।

ताजा मारा हुआ तथा अदूषित मांस-मांस तथा धातु की वृद्धि करता है। जो मांस सड़ा हुआ, गुरु एवं साररहित हो वह अवृष्य तथा अबृंहण होता है ।

**वक्तव्य—**चरक सू. अ. २५ तथा सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अत्यन्त विस्तारपूर्वक देश, काल, अवस्था, लिङ्ग, जाति तथा अङ्गों के भेद से मांस के गुणों का वर्णन किया गया है ॥६८॥

एवं मांसविशेषज्ञः कल्पयेद्भोजने सदा । बालानां गुर्विणीनां वा बालपुत्रासु वा भिषक् ।।६९।।
दुष्प्रजातासु वा स्त्रीषु बाले वा कृशिते सदा । प्रयुञ्जन् सिद्धिमप्नोति तत्त्वविद् वृद्धजीवक ! ।।७०।।

इस प्रकार मांस के गुणों को जानने वाले व्यक्तियों को भोजन में सदा मांस की कल्पना करनी चाहिये । हे वृद्धजीवक ! जो तत्त्ववेत्ता मनुष्य बालक, गर्भिणी, छोटी लड़की, दुष्प्रजाता स्त्री तथा कृश बालकों में इस प्रकार कल्पनानुसार मांस का प्रयोग करता है वह सिद्धि (सफलता) को प्राप्त करता है ॥६९-७०॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)