कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| इत्यादि । ध्रुवं च कूटस्थं नित्यं<br>न पृथिव्यादिवदापेक्षिकं नित्य-<br>त्वम् । तदेवंभूतं ब्रह्मात्मानं<br>निचाय्यावगम्य तमात्मानं मृत्यु-<br>मुखान्मृत्युगोचरादविद्याकाम-<br>कर्मलक्षणात्प्रमुच्यते विमुच्यते । | गयी है। इसी प्रकार वह ध्रुव—<br>कूटस्थ नित्य है। उसकी नित्यता<br>पृथिवी आदिके समान आपेक्षिक<br>नहीं है। उस इस प्रकारके<br>ब्रह्म—आत्माको जानकर पुरुष<br>मृत्युमुखसे—अविद्या, काम और<br>कर्मरूप मृत्युके पंजेसे मुक्त—वियुक्त<br>हो जाता है ॥ १५ ॥ |
| प्रस्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुतिः— | अब प्रस्तुत विज्ञानकी स्तुतिके लिये श्रुति कहती है— |
प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥
नचिकेताद्वारा प्राप्त तथा मृत्युके कहे हुए इस सनातन विज्ञानको कह और सुनकर बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ॥१६॥
| नाचिकेतं नचिकेतसा प्राप्तं<br>नाचिकेतं मृत्युना प्रोक्तं मृत्यु-<br>प्रोक्तमिदमाख्यानमुपाख्यानं<br>वल्लीत्रयलक्षणं सनातनं चिरन्तनं<br>वैदिकत्वादुक्त्वा ब्राह्मणेभ्यः<br>श्रुत्वाचार्येभ्यो मेधावी ब्रह्मैव<br>लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत<br>आत्मभूत उपास्यो भवतीत्यर्थः<br>॥ १६ ॥ | नचिकेताद्वारा प्राप्त किये तथा<br>मृत्युके कहे हुए इस तीन वल्लियों-<br>वाले उपाख्यानको, जो वैदिक<br>होनेके कारण सनातन—चिरन्तन<br>है, ब्राह्मणोंसे कहकर तथा आचार्यों-<br>से सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्मलोक-<br>में—ब्रह्म ही लोक है; उसमें<br>महिमान्वित होता है अर्थात् सबका<br>आत्मस्वरूप होकर उपासनीय<br>होता है ॥ १६ ॥ |