भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

द्वितीय अध्याय

प्रथमा वल्ली

आत्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता

| एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा<br><br>न प्रकाशते दृश्यते त्वग्र्यया<br><br>बुद्धयेत्युक्तम् । कः पुनः प्रति-<br><br>बन्धोऽग्रचाया बुद्धेर्येन तदभावात्<br><br>आत्मा न दृश्यत इति तद्दर्शन-<br><br>कारणप्रदर्शनार्था वल्लयारभ्यते ।<br><br>विज्ञाते हि श्रेयःप्रतिबन्धकारणे<br><br>तदपनयनाय यत्न आरब्धुं शक्यते<br><br>नान्यथेति— | 'सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ वह आत्मा प्रकाशित नहीं होता; वह तो एकाग्र बुद्धिसे ही देखा जाता है' ऐसा पहले ( १ । ३ । १२ में ) कहा था । अब प्रश्न होता है कि एकाग्र बुद्धिका ऐसा कौन प्रतिबन्ध है जिससे कि उस( एकाग्र बुद्धि ) का अभाव होनेपर आत्मा दिखायी नहीं देता ? अतः आत्मदर्शनके प्रतिबन्धका कारण दिखलानेके लिये यह वल्ली आरम्भ की जाती है, क्योंकि श्रेयके प्रतिबन्धका कारण जान लेनेपर ही उसकी निवृत्तिके यत्नका आरम्भ किया जा सकता है, अन्यथा नहीं— |

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू-<br> स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।<br> कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-<br> दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥

स्वयम्भू ( परमात्मा ) ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है । इसीसे जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं । जिसने अमरत्वको इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियोंको रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगात्माको देख पाता है ॥ १ ॥