कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७
| [आत्मनः सर्व-पुरान्तर्वर्तित्वम्] हंसो हन्ति गच्छतीति । शुचिपच्छुचौदिव्यादित्यात्मना सीदति इति । वसुर्वासयति सर्वानिति । वाय्वात्मानन्तरिक्षे सीदतीत्यन्तरिक्षसत् । होताग्निः “अग्निर्वैहोता” इति श्रुतेः। वेद्यां पृथिव्यां सीदतीति वेदिषद् । “इयं वेदिः परोऽन्तः पृथिव्याः” (ऋ० सं० २।३।२०) इत्यादिमन्त्रवर्णात् । अतिथिः सोमः सन्दुरोणे कलशे सीदति इति दुरोणसत् । ब्राह्मणः अतिथिरूपेण वा दुरोणेषु गृहेषु सीदतीति ।<br><br>नृषन्नृषु मनुष्येषु सीदतीति नृषत् । वरसद् वरेषु देवेषु सीदतीति ऋतसद्धृतं सत्यं यज्ञो वा तस्मिन्सीदतीति । व्योमसद् व्योम्न्याकाशे सीदतीति व्योमसत् । अब्जा अप्सु शङ्खशुक्तिमकरादिरूपेण जायत इति । | वह गमन करता है इसलिये ‘हंस’ है, शुचि—आकाशमें सूर्यरूपसे चलता है इसलिये ‘शुचिपत्’ है, सबको व्याप्त करता है इसलिये ‘वसु’ है, वायुरूपसे आकाशमें चलता है इसलिये ‘अन्तरिक्षसत्’ है, “अग्नि ही होता है” इस श्रुतिके अनुसार ‘होता’ अग्निको कहते हैं, वेदी—पृथिवीमें गमन करता है अतः ‘वेदिषद्’ है, जैसा कि “यह वेदी पृथिवी (यज्ञभूमि) का उत्कृष्ट मध्यभाग है” इत्यादि मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है। यह अतिथि—सोम होकर दुरोण—कलशमें स्थित होता है इसलिये ‘दुरोणसत्’ है। अथवा ब्राह्मण अतिथिरूपसे दुरोण—घरोंमें रहता है इसलिये वही ‘अतिथिः दुरोणसत्’ है।<br><br>वह मनुष्योंमें जाता है इसलिये ‘नृषत्’ है, वर—देवताओंमें जाता है इसलिये ‘वरसत्’ है, ऋत—सत्य अथवा यज्ञको कहते हैं उसमें गमन करता है इसलिये ‘ऋतसत्’ है, व्योम—आकाशमें चलता है इसलिये ‘व्योमसत्’ है। अप्—जलमें शंख, सीपी और मकर आदि रूपोंसे उत्पन्न होता है इसलिये |