कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 132, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 132
| १२० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
देहस्थ आत्मा ही जीवन है
अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥
इस शरीरस्थ देहीके भ्रष्ट हो जानेपर—इस देहसे मुक्त हो जानेपर भला इस शरीरमें क्या रह जाता है ? [ अर्थात् कुछ भी नहीं रहता ] यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ ४ ॥
| किं च | तथा |
|---|---|
| अस्य शरीरस्थस्यात्मनो विस्रंसमानस्यावस्रंसमानस्य भ्रंशमानस्य देहिनो देहवतः; विस्रंसनशब्दार्थमाह—देहाद्विमुच्यमानस्येति किमत्र परिशिष्यते प्राणादिकलापे न किञ्चन परिशिष्यतेऽत्र देहे पुरस्वामिनिविद्रवण इव पुरवासिनां यस्यात्मनोऽपगमे क्षणमात्रात्कार्यकरणकलापरूपं सर्वमिदं हतबलं विध्वस्तं भवति विनष्टं भवति सोऽन्यः सिद्धः॥४॥ | इस शरीरस्थ देही—देहवान् आत्माके विस्रंसमान—अवस्रंसमान अर्थात् भ्रष्ट हो जानेपर इस प्राणादि समुदायमेंसे भला क्या रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं रहता। 'देहाद्विमुच्यमानस्य' ऐसा कहकर विस्रंसन शब्दका अर्थ बतलाया गया है। नगरके स्वामीके चले जानेपर जैसे पुरवासियोंकी दुर्दशा होती है उसी प्रकार इस शरीरमें, जिस आत्माके चले जानेपर, एक क्षणमें ही यह भूत और इन्द्रियोंका समुदायरूप सबका सब बलहीन–विध्वस्त अर्थात् नष्ट हो जाता है वह इससे भिन्न ही सिद्ध होता है ॥ ४ ॥ |