भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 182 में से

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पृष्ठ 145

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३


| यत्तदात्मविज्ञानं सुखम् अनिर्देश्यं निर्देष्टुमशक्यं परमं प्रकृष्टं प्राकृतपुरुषवाङ्मनसयोरगोचरम् अपि सन्निवृत्तैषणा ये ब्राह्मणास्ते यत्तदेतत्प्रत्यक्षमेवेति मन्यन्ते । कथं नु केन प्रकारेण तत् सुखमहं विजानीयाम् । इदम् इत्यात्मबुद्धिविषयमापादयेयं यथा निवृत्तैषणा यतयः । किमु तद्भाति दीप्यते प्रकाशात्मकं तद्यतोऽस्मद्बुद्धिगोचरत्वेन विभाति विस्पष्टं दृश्यते किं वा नेति ॥ १४ ॥ | यह जो आत्मविज्ञानरूप सुख है वह अनिर्देश्य—कथन करनेके अयोग्य, परम अर्थात् प्रकृष्ट और साधारण पुरुषोंके वाणी और मनका अविषय भी है; तो भी जो सब प्रकारकी एषणाओंसे रहित ब्राह्मणलोग हैं वे उसे प्रत्यक्ष ही मानते हैं। उस आत्मसुखको मैं कैसे जान सकूँगा ? अर्थात् निष्काम यतियोंके समान 'वह यही है' इस प्रकार उसे कैसे अपनी बुद्धिका विषय बनाऊँगा ? वह प्रकाशस्वरूप है, सो क्या वह भासता है—हमारी बुद्धिका विषय होकर स्पष्ट दिखलायी देता है, या नहीं ? ॥ १४ ॥ | | अत्रोत्तरमिदं भाति च विभाति चेति । कथम् ? | इसका उत्तर यही है कि वह भासता है और विशेषरूपसे भासता है । किस प्रकार ? [सो कहते हैं—] |


सर्वप्रकाशकका अप्रकाश्यत्व

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥

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