कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 154, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 154
| १४२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति
| तच्च, | और उस (भयके कारण-स्वरूप ब्रह्म) को— |
|---|
इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः ।
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
यदि इस देहमें इसके पतनसे पूर्व ही [ब्रह्मको] जान सका तो बन्धनसे मुक्त होता है यदि नहीं जान पाया तो इन जन्म-मरणशील लोकोंमें वह शरीर-भावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ॥ ४ ॥
| इह जीवन्नेव चेद्यद्यशकत शक्नोति शक्तः सञ्जानात्येतद्भयकारणं ब्रह्म बोद्धुमवगन्तुं प्राक्पूर्वं शरीरस्य विस्रसोऽवस्रंसनात्पतनात्संसारबन्धनाद्विमुच्यते । न चेदशकद्बोद्धुं ततः अनवबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येषु स्रष्टव्याः प्राणिन इति सर्गाः पृथिव्यादयो लोकास्तेषु सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय शरीरभावाय कल्पते समर्थो भवति शरीरं गृह्णातीत्यर्थः । तस्माच्छरीरविस्रंसनात्प्रागात्मबोधाय यत्न आस्थेयः ॥ ४ ॥ | यदि इस देहमें अर्थात् जीवित रहते हुए ही शरीरका पतन होनेसे पूर्व साधक पुरुषने इन सूर्यादिके भयके हेतुभूत ब्रह्मको जान लिया तो वह संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है; और यदि उसे न जान सका तो उसका ज्ञान न होनेके कारण वह सर्गोंमें जिनमें स्रष्टव्य प्राणियोंकी रचना की जाती है उन पृथिवी आदि लोकोंमें शरीरत्व—शरीरभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है अर्थात् शरीर ग्रहण कर लेता है। अतः शरीरपातसे पूर्व ही आत्मज्ञानके लिये यत्न करना चाहिये ॥ ४ ॥ |
|---|