कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| एव दर्शनमात्मनः कर्मफलोप-भोगासक्तत्वात् । यथा चाप्सु अविभक्तावयवमात्मरूपं परीव ददृशे परिदृश्यत इव तथा गन्धर्व-लोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मनः। एवं च लोकान्तरेष्वपि शास्त्र-प्रामाण्यादवगम्यते। छायातपयो-रिवात्यन्तविविक्तं ब्रह्मलोक एव एकस्मिन् । स च दुष्प्रापोऽत्यन्त-विशिष्टकर्मज्ञानसाध्यत्वात् । तस्मादात्मदर्शनायेहैव यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥ | भी अस्पष्ट आत्मदर्शन होता है, क्योंकि वहाँ जीव कर्मफलके उप-भोगमें आसक्त रहता है। तथा जिस प्रकार जलमें अपना स्वरूप ऐसा दिखलायी देता है, मानो उसके अवयव विभक्त न हों उसी प्रकार गन्धर्वलोकमें भी अस्पष्टरूपसे ही आत्माका दर्शन होता है। अन्य लोकोंमें भी शास्त्रप्रमाणसे ऐसा ही [ अर्थात् अस्पष्ट आत्मदर्शन ही ] माना जाता है। एकमात्र ब्रह्म-लोकमें ही छाया और प्रकाशके समान वह आत्मदर्शन अत्यन्त स्पष्टतया होता है। किन्तु अत्यन्त विशिष्ट कर्म और ज्ञानसे साध्य होनेके कारण वह ब्रह्मलोक बड़ा ही दुष्प्राप्य है। अतः अभिप्राय यह है कि इस मनुष्यलोकमें ही आत्मदर्शनके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५ ॥ | | कथमसौ बोद्धव्यः किं वा तदवबोधे प्रयोजनमित्युच्यते— | उस आत्माको किस प्रकार जानना चाहिये और उसके जान-नेमें क्या प्रयोजन है ? इसपर कहते हैं— |
आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥