भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 172
१६०कठोपनिषद्[ अध्याय २

| धर्मत्वमापेक्षिकम् । “आभूतसं-<br>प्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते”<br>(वि० पु० २ । ८ । ९७)<br>इति स्मृतेः । ब्रह्मणा वा सह<br>कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति<br>भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोक-<br>गतान् । विष्वङ्नानाविधगतयः<br>अन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्तं<br>भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एव<br>भवन्तीत्यर्थः ॥ १६ ॥ | को प्राप्त हो जाता है, जैसा कि<br>“सम्पूर्ण भूतोंके क्षयपर्यन्त रहने-<br>वाला स्थान अमृतत्व कहलाता है”<br>इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ।<br>अथवा [ यह भी तात्पर्य हो सकता<br>है कि ] कालान्तरमें ब्रह्माके साथ<br>ब्रह्मलोकके अनुपम भोगोंको भोगकर<br>मुख्य अमृतत्वको प्राप्त करता है ।<br>इसके सिवा जिनकी गति विविध<br>भाँतिकी हैं ऐसी अन्य सब नाड़ियाँ<br>प्राणप्रयाणकी हेतु होती हैं, अर्थात्<br>वे संसारप्राप्तिके लिये ही होती<br>हैं ॥ १६ ॥ |

| इदानीं सर्ववल्ल्यर्थोपसंहा-<br>रार्थमाह— | अब सम्पूर्ण वल्लियोंके अर्थका<br>उपसंहार करनेके लिये कहते हैं— |

उपसंहार

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥

अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवोंके हृदयदेशमें स्थित है । मूँजसे सींकके समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीरसे बाहर निकाले [ अर्थात् शरीरसे पृथक् करके अनुभव करे ] । उसे शुक्र ( शुद्ध ) और अमृतरूप समझे, उसे शुक्र और अमृतरूप समझे ॥ १७ ॥