कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
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( ३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| नैव वाचा न मनसा | २ | ३ | १२ | १५२ |
| नैषा तर्केण मतिः | १ | २ | ९ | ५० |
| पराचः कामाननुयन्ति | २ | १ | २ | ९७ |
| पराञ्चि खानि व्यतृणत् | २ | १ | १ | ९४ |
| पीतोदका जग्धतृणा | १ | १ | ३ | ८ |
| पुरमेकादशद्वारम् | २ | २ | १ | ११४ |
| प्र ते ब्रवीमि तदु | १ | १ | १४ | १९ |
| बहूनामेमि प्रथमः | १ | १ | ५ | १० |
| भयादस्याग्निस्तपति | २ | ३ | ३ | १४१ |
| मनसैवेदमाप्तव्यम् | २ | १ | ११ | १०८ |
| महतः परमव्यक्तम् | १ | ३ | ११ | ८२ |
| मृत्युप्रोक्तां नाचकेतः | २ | ३ | १८ | १६१ |
| य इमं परमम् | १ | ३ | १७ | ९३ |
| य इमं मध्वदम् | २ | १ | ५ | १०२ |
| य एष सुप्तेषु जागर्ति | २ | २ | ८ | १२४ |
| यच्छेद्वाङ्मनसी | १ | ३ | १३ | ८६ |
| यतश्चोदेति सूर्यः | २ | १ | ९ | १०६ |
| यथादर्शे तथा | २ | ३ | ५ | १४३ |
| यथा पुरस्ताद्भविता | १ | १ | ११ | १६ |
| यथोदकं दुर्गे वृष्टम् | २ | १ | १४ | १११ |
| यथोदकं शुद्धे शुद्धम् | २ | १ | १५ | ११२ |
| यदा पञ्चावतिष्ठन्ते | २ | ३ | १० | १४९ |
| यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते | २ | ३ | १५ | १५७ |
| यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते | २ | ३ | १४ | १५५ |
| यदिदं किं च जगत्सर्वम् | २ | ३ | २ | १४० |
| यदेवेह तदमुत्र | २ | १ | १० | १०७ |
| यस्तु विज्ञानवान् | १ | ३ | ६ | ७८ |
| ” | १ | ३ | ८ | ७९ |
| यस्त्वविज्ञानवान् | १ | ३ | ५ | ७७ |
| ” | १ | ३ | ७ | ७९ |
| यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति | १ | १ | २९ | ३७ |
| यस्य ब्रह्म च क्षत्रम् | १ | २ | २५ | ७० |