भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 26
१४कठोपनिषद्[ अध्याय १
वसति। तस्मादनुपेक्षणीयः सर्वावस्थास्वप्यतिथिरित्यर्थः ॥ ८ ॥यह है कि अतिथि सभी अवस्थाओंमें अनुपेक्षणीय है ॥ ८ ॥
एवमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतसमुपगम्य पूजापुरःसरम्—[मन्त्रियोंद्वारा] इस प्रकार कहे जानेपर यमराजने नचिकेताके पास जा उसकी पूजा करनेके अनन्तर कहा—

यमराजका वरप्रदान

तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे
अनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९ ॥

हे ब्रह्मन् ! तुम्हें नमस्कार हो; मेरा कल्याण हो। तुम नमस्कार-योग्य अतिथि होकर भी मेरे घरमें तीन रात्रितक बिना भोजन किये रहे; अतः एक-एक रात्रिके लिये एक-एक करके मुझसे तीन वर माँगलो ॥९॥

तिस्रो रात्रीर्यद्यस्मादवात्सीः उषितवानसि गृहे मे ममानश्नन् हे ब्रह्मन्नतिथिः सन्नमस्यो नमस्कारार्हश्च तस्मान्नमस्ते तुभ्यमस्तु भवतु । हे ब्रह्मन्स्वस्ति भद्रं मेऽस्तु तस्माद्भवतोऽनशनेन मद्गृहवासनिमित्ताद्दोषात्तत्प्राप्त्युपशमेन । यद्यपि भवदनुग्रहेण सर्वं मम स्वस्ति स्यात्तथापि त्वदधिक-हे ब्रह्मन् ! क्योंकि अतिथि और नमस्कारयोग्य होकर भी तुम तीन रात्रितक बिना कुछ भोजन किये मेरे घरमें रहे हो, अतः तुम्हें नमस्कार है। हे ब्रह्मन् ! मेरे घरमें बिना भोजन किये आपके निवास करनेके निमित्तसे हुए दोषसे, उससे प्राप्त हुए अनिष्ट फलकी शान्तिद्वारा, मेरा मंगल—शुभ हो । यद्यपि तुम्हारी कृपासे ही मेरा सब प्रकार कल्याण हो जायगा, तथापि