भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७

| सन् इतरा अपि रात्रीः सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीतमन्युर्विगतमन्युश्च भविता स्याच्चा पुत्रं ददृशिवानदृष्टवान् स मृत्योर्मुखान्मृत्युगोचरात् प्रमुक्तं सन्तम् ॥ ११ ॥ | अर्थात् मुझसे आज्ञप्त होकर वह शेष रात्रियोंमें भी सुखपूर्वक यानी प्रसन्न चित्तसे शयन करेगा तथा [यह सोचकर] वीतमन्यु—क्रोधहीन हो जायगा कि तुझ पुत्रको मृत्युके मुखसे अर्थात् मृत्युके अधिकारसे मुक्त हुआ देखा है ॥११॥ |

| नचिकेता उवाच— | नचिकेता बोला— |

स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति
न तत्र त्वं न जरया बिभेति।
उभे तीर्त्वाशनायापिपासे
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥

हे मृत्युदेव ! स्वर्गलोकमें कुछ भी भय नहीं है। वहाँ आपका भी वश नहीं चलता। वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भी नहीं डरता। स्वर्गलोकमें पुरुष भूख-प्यास—दोनोंको पार करके शोकसे ऊपर उठकर आनन्द मानता है ॥ १२ ॥

| स्वर्गे लोके रोगादिनिमित्तं भयं किंचन किंचिदपि नास्ति। न च तत्र त्वं मृत्यो सहसा प्रभवस्यतो जरया युक्त इह लोकवच्चत्तो न बिभेति कुतश्चित् तत्र। किंचोभे अशनायापिपासे तीर्त्वातिक्रम्य शोकमतीत्य गच्छतीति शोकातिगः सन् | स्वर्गलोकमें रोगादिके कारण होनेवाला भय तनिक भी नहीं है। हे मृत्यो ! वहाँ आपकी भी सहसा दाल नहीं गलती। अतः इस लोकके समान वहाँ वृद्धावस्थासे युक्त होकर कोई पुरुष आपसे कहीं नहीं डरता। बल्कि पुरुष भूख-प्यास दोनोंको पार करके, जो शोकको अतिक्रमण कर जाय ऐसा |