कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 31, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 31
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९
| मृत्योः प्रतिज्ञेयम्— | यह मृत्युकी प्रतिज्ञा है— |
|---|
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥
हे नचिकेतः ! उस स्वर्गप्रद अग्निको अच्छी तरह जाननेवाला मैं तेरे प्रति उसका उपदेश करता हूँ । तू उसे मुझसे अच्छी तरह समझ ले । इसे तू अनन्तलोकको प्राप्ति करानेवाला, उसका आधार और बुद्धिरूपी गुहामें स्थित जान ॥ १४ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| प्र ते तुभ्यं प्रब्रवीमि; यत्त्वया प्रार्थितं तदु मे मम वचसो निबोध बुध्यस्वैकाग्रमनाः सन्स्वर्ग्यं स्वर्गाय हितं स्वर्गसाधनमग्निं हे नचिकेतः प्रजानन्विज्ञातवानहं सन्नित्यर्थः। प्रब्रवीमि तन्निबोधेति च शिष्यबुद्धिसमाधानार्थं वचनम् ।<br><br>अधुनाग्निं स्तौति। अनन्तलोकाप्तिं स्वर्गलोकफलप्राप्तिसाधनम् इत्येतत्, अथो अपि प्रतिष्ठाम् आश्रयं जगतो विराड्रूपेण, तमेतमग्निं मयोच्यमानं विद्धि जानीहि त्वं निहितं स्थितं गुहायां विदुषां बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः ॥ १४ ॥ | हे नचिकेतः ! जिसके लिये तुमने प्रार्थना की थी उस स्वर्ग्य—स्वर्गप्राप्तिमें हितावह अर्थात् स्वर्गके साधनरूप अग्निको तू एकाग्रचित्त होकर मेरे वचनसे अच्छी तरह समझ ले उसे सम्यक् प्रकारसे जाननेवाला—उसका विशेषज्ञ मैं तेरे प्रति उसका वर्णन करता हूँ। 'मैं कहता हूँ' 'तू उसे समझ ले' ये वाक्य शिष्यके बुद्धिको समाहित करनेके लिये हैं।<br><br>अब उस अग्निकी स्तुति करते हैं। जो अनन्त लोकाप्ति अर्थात् स्वर्गलोकरूप फलकी प्राप्तिका साधन तथा विराटरूपसे जगत्की प्रतिष्ठा—आश्रय है मेरे द्वारा कहे हुए उस इस अग्निको तू गुहामें अर्थात् बुद्धिमान् पुरुषोंकी बुद्धिमें स्थित जान ॥ १४ ॥ |