कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ कठोपनिषद् [ अध्याय १
| पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह— | यमराज फिर भी कर्मकी स्तुति ही करते हैं— |
नाचिकेत अग्निचयनका फल
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं
त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाँ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥
त्रिणाचिकेत अग्निका तीन बार चयन करनेवाला मनुष्य [माता, पिता और आचार्य—इन] तीनोंसे सम्बन्धको प्राप्त होकर जन्म और मृत्युको पार कर जाता है। तथा ब्रह्मसे उत्पन्न हुए, ज्ञानवान् और स्तुतियोग्य देवको जानकर और उसे अनुभव कर इस अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।
| त्रिणाचिकेतस्त्रिः कृत्वोऽग्निश्चितो येन स त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञानस्तदध्ययनस्तदनुष्ठानवान्वा। त्रिभिर्मातृपित्राचार्यैरेत्य प्राप्य सन्धिं सन्धानं सम्बन्धं मात्राद्यनुशासनं यथावत्प्राप्येत्येतत्। तद्धि प्रामाण्यकारणं श्रुत्यन्तरादवगम्यते यथा “मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्” (बृ० उ० ४।१।२) इत्यादेः। | जिसने तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन किया है उसे त्रिणाचिकेत कहते हैं। अथवा उसका ज्ञान अध्ययन और अनुष्ठान करनेवाला ही त्रिणाचिकेत है। वह त्रिणाचिकेत माता, पिता और आचार्य इन तीनोंसे सन्धि—सन्धान यानी सम्बन्धको प्राप्त होकर अर्थात् यथाविधि माता आदिकी शिक्षाको प्राप्त कर; क्योंकि एक दूसरी श्रुतिसे उनकी शिक्षा ही धर्मज्ञानकी प्रामाणिकतामें हेतु मानी गयी है; जैसा कि—“माता पिता एवं आचार्यसे शिक्षित पुरुष कहे” इत्यादि श्रुतिसे जाना जाता है। |