भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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२८कठोपनिषद्[ अध्याय. १

| किमयम्रैकान्ततो निःश्रेयस-<br>साधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्प-<br>रीक्षणार्थमाह— | यह ( नचिकेता ) निःश्रेयसके<br>साधन आत्मज्ञानके योग्य पूर्णतया<br>है या नहीं—इस बातकी परीक्षा<br>करनेके लिये यमराजने कहा— |

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥

पूर्वकालमें इस विषयमें देवताओंको भी सन्देह हुआ था, क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म सुगमतासे जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेताः ! तू दूसरा वर माँग ले, मुझे न रोक । तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥

| देवैरप्यत्रैतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्वं न हि सुज्ञेयं सुष्ठु ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्जनैर्यतोऽणुः सूक्ष्म एष आत्माख्यो धर्मोऽतोऽन्यमसंदिग्धफलं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मां मोपरोत्सीरुपरोधं मा कार्षीरधमर्णम् इवोत्तमर्णः । अतिसृज विमुञ्च एनं वरं मा मां प्रति ॥ २१ ॥ | इस आत्मतत्त्वके विषयमें पहले—पूर्वकालमें देवताओंने भी विचिकित्सा—संशय किया था । साधारण पुरुषोंके लिये यह तत्त्व सुने जानेपर भी सुज्ञेय—अच्छी तरह जानने योग्य नहीं है, क्योंकि यह 'आत्मा' नामवाला धर्म बड़ा ही अणु—सूक्ष्म है । अतः हे नचिकेताः ! कोई दूसरा निश्चित फल देनेवाला वर माँग ले । जैसे धनी ऋणीको दबाता है उसी प्रकार तू मुझे न रोक । इस वरको तू मेरे लिये छोड़ दे ॥ २१ ॥ |

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