भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 64
५२कठोपनिषद्[ अध्याय १

कर्मफलकी अनित्यता

जानाम्यहँ शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि-
रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥

मैं यह जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधनोंद्वारा वह नित्य [ आत्मा ] प्राप्त नहीं किया जा सकता । तब मेरेद्वारा नाचिकेत अग्निका चयन किया गया । उन अनित्य पदार्थोंसे ही मैं [ आपेक्षिक ] नित्य [ याम्यपद ] को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १० ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
जानाम्यहं शेवधिर्निधिः कर्मफललक्षणो निधिरिव प्रार्थ्यत इति । असावनित्यमनित्य इति जानामि । न हि यस्मादनित्यैः अध्रुवैर्नित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमात्माख्यः शेवधिः । यस्त्वनित्यसुखात्मकः शेवधिः स एवानित्यैर्द्रव्यैः प्राप्यते ।<br><br>हि यतस्ततस्तस्मान्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनैर्न प्राप्यत इति नाचिकेतश्चितोऽग्निः अनित्यैर्द्रव्यैः पश्वादिभिः स्वर्गसुखसाधनभूतोऽग्निर्निवर्तितजिसके लिये निधि (खजाने)के समान प्रार्थना की जाती है वह कर्मफलरूप निधि ही 'शेवधि' है । यह अनित्य—सदा न रहनेवाली है—ऐसा मैं जानता हूँ । क्योंकि इन अनित्य यानी अस्थिर साधनोंसे वह परमात्मा नामक नित्य—स्थिर निधि प्राप्त नहीं की जा सकती । जो निधि अनित्यसुखरूप है वही अनित्य पदार्थोंसे प्राप्त होती है।<br><br>क्योंकि ऐसा है इसलिये मैंने यह जान-बूझकर भी कि 'अनित्य साधनोंसे नित्यकी प्राप्ति नहीं होती' नाचिकेत अग्निका चयन किया था; अर्थात् पशु आदि अनित्य पदार्थोंसे स्वर्ग-सुखके साधनस्वरूप उस अग्निका