कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ कठोपनिषद् [ अध्याय १
$ \begin{gathered} एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य मर्त्यः \ प्रवृह्य धर्म्म्यमणुमेतमाप्य । \ स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा \ विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ \end{gathered} $
मनुष्य इस आत्मतत्त्वको सुनकर और उसे भली प्रकार ग्रहणकर धर्मी आत्माको देहादि संघातसे पृथक् करके इस सूक्ष्म आत्माको पाकर तथा इस मोदनीयकी उपलब्धि कर अति आनन्दित हो जाता है। मैं [ तुझ ] नचिकेताको खुले हुए ब्रह्मभवनवाला समझता हूँ, [ अर्थात् हे नचिकेतः ! मेरे विचारसे तेरे लिये मोक्षका द्वार खुला हुआ है ] ॥१३॥
| एतदात्मतत्त्वं यदहं वक्ष्यामि तच्छ्रुत्वाचार्यप्रसादात्सम्यगात्मभावेन परिगृह्योपादाय मर्त्यो मरणधर्मा धर्मादनपेतं धर्म्यं प्रवृह्योद्यम्य पृथक्कृत्य शरीरादेः अणुं सूक्ष्ममेतमात्मानम् आप्य प्राप्य स मर्त्यो विद्वान्मोदते मोदनीयं हर्षणीयमात्मानं लब्ध्वा। तदेतदेवंविधं ब्रह्म सद्म भवनं नचिकेतसं त्वां प्रत्यपावृतद्वारं विवृतमभिमुखीभूतं मन्ये मोक्षार्हं त्वां मन्य इत्यभिप्रायः॥ १३॥ | इस आत्मतत्त्वको, जिसका कि अब मैं वर्णन करूँगा, उसे सुनकर—आचार्यकी कृपासे भली प्रकार आत्मभावसे ग्रहण कर मरणधर्मा मनुष्य इस धर्म्य—धर्मविशिष्ट आत्मा—को शरीरादिसे उद्यमन करके यानी पृथक् करके तथा इस अणु अर्थात् सूक्ष्म और मोदनीय—हर्षयोग्य आत्माको उपलब्ध कर वह मरणशील विद्वान् आनन्दित हो जाता है। इस प्रकारके तुझ नचिकेताके प्रति मैं ब्रह्मभवनको खुले द्वारवाला अर्थात् अभिमुख हुआ मानता हूँ। अभिप्राय यह कि मैं तुझे मोक्षके योग्य समझता हूँ ॥ १३ ॥ |