भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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भले ही व्यर्थ आग्रह और मानसिक संकीर्णता जान पड़े तथापि वह परिणाममें सर्वदा मंगलमय ही होता है। भगवान् रामका वनवास, परशुरामजीका मातृवध, पुरुका यौवनदान, तथा पाँच पाण्डवोंका एक ही द्रौपदीके साथ पाणिग्रहण करना—ये सब प्रसङ्ग इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं। ऐसा ही नचिकेताके साथ भी हुआ। उनका यमलोक-गमन उन्हींके लिये नहीं उनके पिताके लिये और सारे संसारके लिये भी कल्याणकर ही हुआ।

यमलोकमें पहुँचनेपर भी जबतक यमराजसे उनकी भेंट नहीं हुई तबतक उन्होंने अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। इससे भी उनकी प्रौढ सत्यनिष्ठाका पता लगता है। उनका शरीर यमराजको दान किया जा चुका था, अतः अब उसपर यमराजका ही पूर्ण अधिकार था; उनका तो सबसे पहला कर्तव्य यही था कि वे उसे धर्मराजको सौंप दें। इसीसे वे भोजनाच्छादनादिकी चिन्ता छोड़कर यमराजके द्वारपर ही पड़े रहे। तीन दिन पश्चात् जब यमराज आये तो उन्होंने उन्हें एक-एक दिनके उपवासके लिये एक-एक वर दिया। इससे अतिथिसत्कारका महत्त्व प्रकट होता है। अतिथिकी उपेक्षा करनेसे कितनी हानि होती है—यह बात वहाँ (अ० १ व० १ मं० ७, ८ में) स्पष्टतया बतलायी गयी है।

इसपर नचिकेताने यमराजसे जो तीन वर माँगे हैं उनके क्रममें भी एक अद्भुत रहस्य है। उनका पहला वर था पितृपरितोष। वे पिताके सत्यकी रक्षाके लिये उनकी इच्छाके विरुद्ध यमलोकको चले आये थे। इससे उनके पिता स्वभावतः बहुत खिन्न थे। इसलिये उन्हें सबसे पहले यही आवश्यक जान पड़ा कि उन्हें शान्ति मिलनी चाहिये। यह नियम है कि यदि हमारे कारण किसी व्यक्तिको खेद हो तो, जबतक हम उसका खेद निवृत्त न कर देंगे, हमें भी शान्ति नहीं मिल सकती। यह नियम मनुष्यमात्रके लिये समान है; और यहाँ तो स्वयं उनके पूज्य पिताको ही खेद था; इसलिये सबसे पहले उनकी शान्ति अभीष्ट होनी ही चाहिये थी। यह पितृपरितोष उनकी दृष्ट शान्तिका कारण था, इसलिये सबसे पहले उन्होंने यही वर माँगा।