कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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यही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही पर आलम्बन है। इस आलम्बनको जानकर पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥
| एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्या- <br> लम्बनानां श्रेष्ठं प्रशस्ततमम् । <br> एतदालम्बनं परमपरं च परापर- <br> ब्रह्मविषयत्वात् । एतदालम्बनं <br> ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते परस्मिन् <br> ब्रह्मणि । अपरस्मिंश्च ब्रह्मभूतो <br> ब्रह्मवदुपास्यो भवतीत्यर्थः ॥१७॥ | यह [ओंकाररूप] आलम्बन ब्रह्मप्राप्तिके [ गायत्री आदि ] सभी आलम्बनोंमें श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है । पर और अपर ब्रह्मविषयक होनेसे यह आलम्बन पर और अपररूप है । तात्पर्य यह है कि इस आलम्बनको जानकर साधक ब्रह्मलोक अर्थात् परब्रह्ममें स्थित होकर महिमान्वित होता है तथा अपर ब्रह्ममें ब्रह्मत्वको प्राप्त होकर ब्रह्मके समान उपासनीय होता है ॥ १७ ॥ | | अन्यत्र धर्मादित्यादिना पृष्टस्यात्मनोऽशेषविशेषरहितस्य आलम्बनत्वेन प्रतीकत्वेन चोङ्कारो निर्दिष्टः; अपरस्य च ब्रह्मणो मन्दमध्यमप्रतिपत्तॄन्प्रति । अथे- दानीं तस्योङ्कारालम्बनस्यात्मनः साक्षात्स्वरूपनिर्दिधारयिषया इदमुच्यते— | उपर्युक्त 'अन्यत्र धर्मात्' इत्यादि श्लोकसे नचिकेताद्वारा पूछे गये सर्वविशेषरहित आत्माके तथा मन्द और मध्यम उपासकोंके लिये अपर ब्रह्मके प्रतीक और आलम्बन रूपसे ओंकारका निर्देश किया गया । अब, जिसका आलम्बन ओंकार है उस आत्माके स्वरूपका साक्षात् निर्धारण करनेकी इच्छासे यह कहा जाता है— |
आत्मस्वरूपनिरूपण
न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।