कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 75, कुल 182 में से
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
| इति योऽप्यन्यो हतः सोऽपि चेन्मन्यते हतमात्मानं हतोऽहमित्युभावपि तौ न विजानीतः स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति अविक्रियत्वादात्मनस्तथा न हन्यत आकाशवदविक्रियत्वादेव। अतोऽनात्मज्ञविषय एव धर्माधर्मादिलक्षणः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य। श्रुतिप्रामाण्यान्न्यायाच्च धर्माधर्माद्यनुपपत्तेः॥१९॥ | है—यह सोचता है कि मैं इसे मारूँगा, तथा दूसरा मारा जानेवाला भी यह समझकर कि 'मैं मारा गया हूँ' अपने (आत्मा) को मारा गया मानता है तो वे दोनों ही अपने आत्माको नहीं जानते; क्योंकि आत्मा अविकारी है, इसलिये वह मार नहीं सकता और आकाशके समान अविकारी होनेसे ही मारा भी नहीं जा सकता। अतः धर्माधर्मादिरूप संसार अनात्मज्ञसे ही सम्बन्ध रखता है, ब्रह्मज्ञसे नहीं। क्योंकि श्रुतिप्रमाण और युक्तिसे भी ब्रह्मज्ञानीद्वारा धर्म-अधर्म आदि नहीं बन सकते ॥१९॥ |
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| कथं पुनरात्मानं जानाति इत्युच्यते— | तो फिर मुमुक्षु पुरुष आत्माको किस रूपसे जानता है ? इसपर कहते हैं— |
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अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२०॥
यह अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् आत्मा जीवकी हृदयरूप गुहामें स्थित है। निष्काम पुरुष अपनी इन्द्रियोंके प्रसादसे आत्माकी उस महिमाको देखता है और शोकरहित हो जाता है ॥२०॥