भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 77
वल्ली २ ]शाङ्करभाष्यार्थ६५

| प्रसादादात्मनो महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्यत्ययम् अहमस्मीति साक्षाद्विजानाति । ततो वीतशोको भवति ॥ २० ॥ | इन धातुओंके प्रसादसे वह अपने आत्माकी कर्मनिमित्तक वृद्धि और क्षयसे रहित महिमाको देखता है; अर्थात् इस बातको साक्षात् जानता है कि 'मैं यह हूँ'। [ऐसा जानकर] फिर वह शोकरहित हो जाता है॥२०॥ |

| अन्यथा दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा कामिभिः प्राकृतपुरुषैः, यस्मात्— | अन्यथा सकाम प्राकृत पुरुषोंके लिये यह आत्मा बड़ा दुर्विज्ञेय है; क्योंकि— |

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥

वह स्थित हुआ भी दूरतक जाता है, शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है । मद ( हर्ष ) से युक्त और मदसे रहित उस देवको भला मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? ॥ २१ ॥

| आसीनोऽवस्थितोऽचल एव सन् दूरं व्रजति । शयानो याति सर्वत एवमसावात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मवानतोऽशक्यत्वाज्ज्ञातुं कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ? | आसीन—अवस्थित अर्थात् अचल होकर भी वह दूर चला जाता है तथा शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है। इस प्रकार वह आत्मा—देव समद और अमद यानी हर्षसहित और हर्षरहित—विरुद्ध धर्मवाला है। अतः जाननेमें न आ सकनेके कारण उस मदयुक्त और मदरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? |