भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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७०शाङ्करभाष्यार्थ[ अध्याय १

| फलार्थित्वानाप्यशान्तमानसो व्यापृतचित्तः प्रज्ञानेन ब्रह्मविज्ञानेनैनं प्रकृतमात्मानमाप्नुयात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत इन्द्रियलौल्याच्च समाहितचित्तः समाधानफलादप्युपशान्तमानसश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन यथोक्तम् आत्मानं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ २४ ॥ | होनेके कारण जो अशान्तचित्त है—जिसका चित्त निरन्तर व्यापार करता रहता है वह पुरुष भी इस प्रस्तुत आत्माको केवल आत्मज्ञानद्वारा नहीं प्राप्त कर सकता । अर्थात् जो पापकर्म और इन्द्रियोंकी चञ्चलतासे हटा हुआ तथा समाहितचित्त और उस समाधानके फलसे भी उपशान्तमना है वह आचार्यवान् साधक ही ब्रह्मज्ञानद्वारा उपर्युक्त आत्माको प्राप्त कर सकता है ॥ २४ ॥ |

यस्त्वनेवंभूतः—किन्तु जो (साधक) ऐसा नहीं है [उसके विषयमें श्रुति कहती है—]

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥

जिस आत्माके ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ओदन—भात हैं तथा मृत्यु जिसका उपसेचन (शाकादि) है वह जहाँ है उसे कौन [अज्ञ पुरुष] इस प्रकार (उपर्युक्त साधनसम्पन्न अधिकारीके समान) जान सकता है ? ॥ २५ ॥

यस्यात्मनो ब्रह्मक्षत्रे सर्वधर्मविधारके अपि सर्वत्राणभूते उभे ओदनोऽशनं भवतः स्याताम्,सम्पूर्ण धर्मोंको धारण करनेवाले और सबके रक्षक होनेपर भी ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों वर्ण जिस आत्माके ओदन—भोजन हैं