कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक ७१ वह गुणाढ्य भी मेरा पक्षपाती शिवजी का माल्यवान् नामक उत्तम गण है। मेरा पक्षपात करने के कारण पार्वती ने उसे क्रोध से शाप दिया इसीलिए मानव-योनि में उत्पन्न हुआ है॥१३०॥ इस गुणाढ्य को शिवजी के द्वारा कही गई और मुझसे सुनाई गई यह कथा सुनाना। तब तुम्हारी और उसकी शाप-मुक्ति होगी ॥१३१॥ इस प्रकार वररुचि काणभूति को कहकर शरीर-त्याग करने के लिए पवित्र बद्रिकाश्रम को गया ॥१३२॥ शाकाहारी मुनि की कथा बद्रिकाश्रम जाते हुए वररुचि ने गङ्गातट पर एक शाकाहारी ब्राह्मण को देखा। वररुचि के सामने ही उस ऋषि का हाथ कुश से कट गया ॥१३३॥ उस ऋषि के अहंकार की परीक्षा के लिए तथा कौतुक से उस निकलते हुए रक्त को वररुचि ने अपने प्रभाव से शाक का रस बना दिया ॥१३४॥ अपने इस प्रभाव को देखकर उस मुनि को घमंड उत्पन्न हुआ यह देखकर वररुचि ने मुसकराते हुए कहा ॥१३५॥ मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिए रक्त को शाक का रस बना दिया। किन्तु मालूम हुआ कि अभी तक तुमने अहंकार को त्यागा नहीं है ॥१३६॥ अहंकार, ज्ञानमार्ग में कठिनाई से हटनेवाली बाधा है और ज्ञान के बिना सैकड़ों यज्ञों से भी मुक्ति नहीं होती ॥१३७॥ पुण्यों के क्षीण होने पर नष्ट हो जानेवाला स्वर्ग मुक्ति चाहनेवाला को आकृष्ट नहीं करता। इसलिए अहंकार का त्याग कर मुक्ति के लिए यत्न करो ॥१३८॥ इस प्रकार मुनि को शिक्षा देकर और नम्र होते हुए उससे स्तुति किया गया वररुचि प्रणाम-पावन बद्रिकाश्रम के स्थान को गया ॥१३९॥ मनुष्य-देह को छोड़ने की इच्छा से वररुचि बद्रिकाश्रम में गाढ़ी भक्ति के साथ देवी की शरण में प्राप्त हुआ। देवी ने स्वयं प्रकट होकर, शरीर की मुक्ति के लिए उसे स्वयं योग द्वारा शरीर से निकली हुई अग्नि से देहपात करने के लिए कहा अर्थात् अपने शरीर से उत्पन्न योगाग्नि से अपने शरीर की मुक्ति के लिए उसे भस्म करो ॥१४०॥ इस प्रकार वररुचि उसी देवी के द्वारा निर्दिष्ट परम्परा से योगाग्नल से मानव-शरीर को दग्ध करके अपनी यक्ष-गति को प्राप्त हुआ और उधर काणभूति दृष्टिगत गुणाढ्य के समागम के प्रति उत्कण्ठित था ॥१४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का पंचम तरंग समाप्त