कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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मदनमंचुका से प्रेम हो गया। उसने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध उससे विवाह कर लिया। एक विद्याधर राजा मदनमंचुका को हर ले गया। मदनमंचुका की खोज करते हुए नरवाहनदत्त ने विद्याधर-लोक और मनुष्य-लोक में नये-नये पराक्रम किए। शीर्ष पराक्रम के बाद मदनमंचुका से उसका मिलन हुआ वह स्वयं विद्याधर चक्रवर्ती बना और मदनमंचुका उसकी पटरानी हुई। इससे पूर्व उसके पराक्रमों की सूची में वह हर बार एक स्त्री से विवाह करता है। इस प्रकार के प्रत्येक पराक्रम के अन्त में गुणाढ्य ने उसका लम्भ यह नाम रखा। इस रीति से नरवाहनदत्त की कथा वेगवती लम्भ अजिनावती लम्भ प्रियदर्शना लम्भ इत्यादि प्रकरणों में विभक्त थी। जैन परम्परा के अनुसार (वसुदेव हिण्डी में) श्रीकृष्ण की प्राचीन कथा की योजना इस प्रकार हुई—वसुदेव अपने बड़े भाई के साथ अनबन होने के कारण घर छोड़कर चले गए और पीछे लम्बे परिभ्रमण के दरम्यान नरवाहनदत्त की तरह पराक्रम करते रहे और अन्त में अपनी अन्तिम पत्नी के रूप में उन्होंने रोहिणी को प्राप्त किया। इस समय अकस्मात् वसुदेव का अपने बड़े भाई के साथ मेल हो गया और वे अपने कुटुम्ब के साथ मिलकर रहने लगे। मदनमंचुका से मिलने और राज्याभिषेक के प्रसंग इस कथा में छोड़ दिए गए हैं क्योंकि कृष्ण की कथा के प्रसंग में उनकी संगति न थी। पर मदनमंचुका के साथ प्रणय प्रसंग का जो विस्तृत वर्णन अन्तिम विवाह में आता था उसे श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ जोड़ दिया गया यह कुछ समझ में नहीं आता। मदनमंचुका के अपहरण का प्रसंग भी वसुदेव के पराक्रमों के वर्णन में छोड़ दिया गया है। कथा के मूलभूत पात्र मदनमंचुका के स्थान में यहां दो पात्र हो गए हैं गणिकापुत्री सुहिरण्या और राजकन्या सोमश्री। "इस तरह मूल बृहत्कथा की वस्तु और उसकी आयोजना की कई एक अनावश्यक घटनाएं इसमें होने से नष्ट हुए मूल ग्रन्थ के स्वरूप के विषय में जैन रूपान्तर की प्राप्ति से कई महत्त्वपूर्ण तथ्य ज्ञात होते हैं। "इससे आगे उल्लेखनीय बात यह है कि काश्मीरी रूपान्तर (कथासरित्सागर) में १८ लम्बकों में कथा विभक्त है। यहाँ भ्रष्ट रूप में प्राप्त लम्बक शब्द की बात हम नहीं कहते। 'म' के बदले 'ब' यह शब्द प्राकृत के अनुसार स्वाभाविक रीति से मूल ग्रन्थ का नहीं है। लम्बक (लम्भक) का अर्थ वह प्रकरण हो सकता है जिसमें नरवाहनदत्त एक पत्नी प्राप्त करता है। पर उदयन की कथा में और ग्रन्थ के आरम्भिक भाग में भी यह शब्द आता है। तो मानना पड़ेगा कि गुणाढ्य के कथा लिखने तक उसके अर्थ का विस्तार नहीं हुआ था। बुधस्वामी का बृहत्कथा- श्लोकसंग्रह काव्यों के समान सर्गों में विभक्त है और उसके उपलब्ध अंश में २८ सर्ग हैं। सब नहीं तो अनेक सर्गों के अन्त में लम्भ शब्द के बदले उसका पर्याय 'लाभ' शब्द मिलता है और जानबूझ कर नियम के रूप में एक लाभ में कई संख्याबद्ध सर्गों का समावेश कर दिया जाता है। लाकोत मानते हैं कि गुणाढ्य की कृति रामायण की तरह अलग-अलग काण्डों में विभक्त थी एवं मुख्य कथा-भाग लम्भों के सहित काण्डों में रचा गया था। जैन रूपान्तर में लम्भ का प्रयोग अपने मूल अर्थ में अर्थात् नरवाहनदत्त की (यहाँ वसुदेव की) विजय के वर्णनात्मक मुख्य कथा भाग के प्रकरणों